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सीधा सवाल। निम्बाहेड़ा। आर्य समाज के 151वें स्थापना वर्ष तथा स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आर्य समाज, शांति नगर, में प्रातः 9.00 बजे आचार्य शिवनाथ आर्य वैदिक (आर्ष गुरुकुल, वानप्रस्थ साधक आश्रम, रोजड़, गुजरात के पावन सान्निध्य में पंचकुण्डीय महायज्ञ एवं सत्संग का भव्य आयोजन किया गया। यह आयोजन संपन्न हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर यज्ञ में आहुतियाँ अर्पित कीं तथा समाज एवं राष्ट्र की उन्नति की कामना की। अपने उद्बोधन में आचार्य शिवनाथ आर्य ने स्वामी श्रद्धानंद जी के प्रेरणादायक जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म 22 फरवरी 1856 को पंजाब के जालंधर ज़िले के तलवन ग्राम में हुआ था। उनका मूल नाम मुंशी राम विज था। उनके पिता नानकचंद ब्रिटिश शासन में पुलिस अधिकारी थे। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों से प्रभावित होकर उनका जीवन पूर्णतः परिवर्तित हो गया और उन्होंने वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु स्वयं को समर्पित कर संन्यास ग्रहण किया तथा “स्वामी श्रद्धानंद” नाम धारण किया। वर्ष 1902 में हरिद्वार के निकट गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना कर भारतीय संस्कृति, वैदिक शिक्षा एवं राष्ट्रभक्ति के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी निभाते हुए उन्होंने स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता का संदेश जन-जन तक पहुँचाया तथा महात्मा गांधी के साथ असहयोग आंदोलन में भी जुड़े। स्वामी श्रद्धानंद जी ने “शुद्धि आंदोलन” के माध्यम से समाज में जागरूकता उत्पन्न की तथा उन लोगों को पुनः स्वधर्म में लाने का प्रयास किया, जो अन्य मतों में चले गए थे। उन्होंने जाति-पांति, छुआछूत एवं सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध सशक्त अभियान चलाया और शिक्षा, महिला उत्थान एवं सामाजिक समानता पर विशेष बल दिया। 23 दिसंबर 1926 को उनका बलिदान हुआ, जो राष्ट्र और धर्म के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का प्रतीक है। उनका जीवन त्याग, सेवा एवं राष्ट्रभक्ति का अद्वितीय उदाहरण है, जिससे आज भी समाज प्रेरणा लेता है।