चित्तौड़गढ़ - अजब बेबसी..बंदर और मदारी की रस्साकशी....!
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चित्तौड़गढ़ / कपासन - पुलिस थाना एवं ए एन्ट्रीएफ टीम की सयुक्त कार्यवाही मे एक बेलेनो कार, एक मोटर साईकिल से 36 किलोग्राम अफीम डोडा चूरा व 16 ग्राम एमडीएम मौली पाउडर जब्त

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चित्तौड़गढ़ - लकड़ियों से चला रहे भंडारा, हर दिन तीन हजार से ज्यादा ले रहे प्रसाद

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* चित्तौड़गढ़ - अजब बेबसी..बंदर और मदारी की रस्साकशी....! * चित्तौड़गढ़ / कपासन - पुलिस थाना एवं ए एन्ट्रीएफ टीम की सयुक्त कार्यवाही मे एक बेलेनो कार, एक मोटर साईकिल से 36 किलोग्राम अफीम डोडा चूरा व 16 ग्राम एमडीएम मौली पाउडर जब्त * चित्तौड़गढ़ - लकड़ियों से चला रहे भंडारा, हर दिन तीन हजार से ज्यादा ले रहे प्रसाद * चित्तौड़गढ़ - लेन-देन के विवाद ने लिया खूनी रूप: रिपोर्ट देने जा रही महिला को कार से कुचलकर हत्या * चित्तौड़गढ़ / चिकारड़ा - मंगलवाड़-निंबाहेड़ा राजमार्ग के नपावली में सड़क हादसा, दो की मौत * चित्तौड़गढ़ / कपासन - महिला ने ट्रेन के आगे कूद कर दी जान, उसके बच्चों के कुएं में मिले शव * चित्तौड़गढ़ - डिग्री मांगी तो 17 कश्मीरी छात्रों को मिली जेल, मेवाड़ यूनिवर्सिटी में बिना मान्यता प्रवेश देने का मामला * चित्तौड़गढ़ - लोहे के पिंजरे में मिल गाय का शव, मंडफिया थाना इलाके की घटना * चित्तौड़गढ़ - स्कूल से घर लौट रही शिक्षिका के गले से छीनी चेन, ऑनलाइन अटेंडेंस के लिए रुकी थी, रेकी कर रहे बदमाशों ने की वारदात * चित्तौड़गढ़ - मंदिर दर्शन कर लौट रही विवाहिता की चेन स्नेचिंग, छीना झपटी में गले पर पड़ा निशान * चित्तौड़गढ़ - अवैध चंद्रनगर में नया खुलासा...।, अनुबंध भूखंड का रजिस्ट्री कृषि भूमि की * चित्तौड़गढ़ - 10वीं शताब्दी में बने समिद्धेश्वर मंदिर को तोड़ने के लिए हुआ था मुस्लिमों का आक्रमण, जहां एक शिला पर बनी त्रिमूर्ति की आज भी होती है पूजा * चित्तौड़गढ़ - नारकोटिक्स ने दबिश दी तो डोडा-चुरा भरी स्कॉर्पियो में लगाई आग, 323 किलो डोडा चूरा पकड़ा, दूसरी कार्यवाही में 9 किलो से ज्यादा अफीम व डेढ़ क्विंटल डोडा- चूरा बरामद * चित्तौड़गढ़ - कपास व सरसों के बीच में अफीम की अवैध बुवाई पकड़ी, साढ़े तीन हजार से ज्यादा पौधे बरामद, दो गिरफ्तार * चित्तौड़गढ़ - आपसी विवाद में युवक को उठा ले जाने से मचा हड़कंप, तलाश में जुटी पुलिस, न्यू क्लॉथ मार्केट का मामला
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सीधा सवाल। चित्तौड़गढ़। जिला मुख्यालय की नगर परिषद पिछले दो सालों से लगातार चर्चाओं में बनी हुई है। तथाकथित वायरल कांड के बाद एक के बाद एक बदले गए प्रशासक,आयुक्त और हालात देखकर ऐसा लग रहा है ,मानो नगर परिषद में केवल खाना पूर्ति चल रही है। वर्तमान में यूआईटी के सचिव महोदय को नगर परिषद का प्रशासक नियुक्त किया गया है। और उनके फरमान ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो सब कुछ तहस-नहस करके ही मानेंगे। बीते लंबे समय से अतिक्रमण हटाने की करवाई लगातार जारी है, परन्तु इस कार्रवाई पर यह कहावत चरितार्थ हो रही है कि जहां राणा जी कहे वहां उदयपुर बसा दो...। एक जगह अतिक्रमण हटाते हैं वहां नोटिस की कागजी कार्रवाई होती है, उसके बाद कोई पूछने वाला नहीं है। शहर की स्वच्छता और सुनियोजित विकास के नाम पर जो अतिक्रमण हटाने की मनमर्जी चलाई जा रही है, उस पर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्योंकि जो नगर परिषद के प्रशासक है वही नगर विकास न्यास के सचिव भी है। यानी कि गंगाधर ही शक्तिमान है। शहर में धड़ल्ले से विकसित हो रही बिना स्वीकृति की कालोनियां जो भविष्य के लिए हानिकारक है, उन पर बतौर यूआईटी सेक्रेटरी कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। ग्रीन बेल्ट में पट्टे कट जाने, सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर निर्माण होने जैसे गंभीर मामले जो भविष्य के लिए हानिकारक है.. उन पर कार्रवाई करने की बजाय दिहाड़ी मजदूरी करने वालों को निशाना बनाया जा रहा है। जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगो को लेकर जनमानस में चर्चा है कि जहां रसूख और पहुंच वाले लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है, वहां गरीब की जोरू सबकी भाभी हो रही है। ऐसा लगता है यह लोग मतदाता भी नहीं है क्योंकि इन्हें कमाकर अपने परिवार का पेट भरने का भी अधिकार नहीं है। यह लोग केवल एक भीड़ है जिस पर अधिकार मिलने पर मन मर्जी के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। यहां सवाल पूछना जरूरी है। अवैध रूप से कॉलोनी काटने वाले जो ,भविष्य में सरकार और मोटी राशि देकर भूखंड खरीदने वालों के लिए समस्या बनेंगे,उन पर गंगाधर और शक्तिमान दोनों रूप धरकर सवारी करने वाले माननीय कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं। आखिर जिनको पहले नोटिस दिए उनके अतिक्रमण अब तक क्यों नहीं हट पाए..। कहीं ऐसा तो नहीं है की अंदर खाने आपस में समझ लिया गया है। आखिर अतिक्रमण के नाम पर जब इतनी कार्रवाई हो रही है, तो विश्व धरोहर दुर्ग जो चित्तौड़ की पहचान है, वहां तोड़ने के लिए चिन्हित किए गए किए 450 से अधिक अतिक्रमण अब तक क्यों बने हुए हैं। इन सवालों का एक सीधा सा जवाब है कि उनके पीछे कोई ना कोई साहब है। और जहां साहब नहीं है वहां राष्ट्रपिता के फोटो लगे कागज मौजूद है, इसलिए उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती है। जनप्रतिनिधियों को भी विचार करने की आवश्यकता है , कि आखिर अधिकारी इतनी मनमर्जी क्यों कर रहे हैं। आखिर क्यों गरीब को निशाना बनाया जा रहा है। दर्जन भर ऐसे मामले हैं, जहां सड़क पर अतिक्रमण है। लेकिन उसके बावजूद जिम्मेदार चुप है.. जनप्रतिनिधि खामोश है। दो जून की रोटी कमाने वाले मजदूरी कर पेट भरने वाले लोगों को निशाना क्यों बनाया जा रहा है ? और इन सब के बीच याद दिला दूं बूंद बूंद से घड़ा भरता है। इन्हीं छोटे-छोटे लोगों ने स्वाभिमान की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया था ... ये वही लोग है जिन्होंने आस्था की अभिव्यक्ति वोट के रूप करके माननीय को दिल्ली भेजने में साथ खड़े रहे हैं । अब उन्हें अधिकारियों की मनमर्जी के भरोसे क्यों छोड़ दिया गया है। या कहीं ऐसा तो नहीं है गरीबी को हटाने के लिए गरीब को हटा दो का नारा लेकर हमारे गंगाधर बनाम शक्तिमान काम कर रहे हैं। जो भी है गरीब का दोष सिर्फ इतना है कि वह गरीब है...। ना तो उसके पास रसूख है और ना ही राष्ट्रपिता फोटो लगे कागजो की पर्याप्त उपलब्धता है। जिनके पास यह दोनों है वह अवैध कॉलोनी बनाएं, या चंद्र सूरज के नाम पर नगर बस कर अवैध रूप से बेच दे , पक्का अतिक्रमण कर ले सरकार के सारे नियम बाईपास कर दें.... उनके लिए कोई कानून नहीं है। मानो उनके लिए तो साहब भी साहब नहीं अपितु इशारों पर नाचने वाली कठपुतली है। लेकिन याद रहे हमारे जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों को इन्हीं लोगों से वोट लेकर किसी को संसद में , तो किसी को विधानसभा में जाना है। और यहां एक बात और भी उल्लेखनीय है की दुर्ग पर हटने वाले अतिक्रमण को लेकर कार्रवाई के बाद हमारे एक माननीय ने इन गरीबों की आवाज देश की सबसे बड़ी पंचायत में उठाई थी। एक अधिकारी का तबादला भी करवाया था। तो क्या अब गरीब गरीब में भी फर्क हो गया...सब जरा सोचिएगा क्योंकि अधिकारियों की इस तरह की कार्य शैली का परिणाम जिसमें भेदभाव साफ दिखाई दे रहा है, हमारे माननीयो को भुगतना पड़ेगा..। क्योंकि एक वोट की कीमत भले ही आस्था स्वाभिमान या किसी अन्य रूप में निर्धारित कर दें... लेकिन गलती से गरीब ने उसकी ताकत समझ ली तो समस्या गंभीर होगी....। यह गंगाधर- शक्तिमान तो चले जाएंगे पर कहीं ऐसा ना हो की इनकी दोगली कार्यशैली आपके ऊपर सवाल खड़े कर दे, और जनता के बीच जवाब देने की स्थिति भी नहीं बन पाए...। और जब जंगल में बंदर राजा बनेगा तो जाहिर है जंगल में बंदर राज में चलेगा...। एक विशेष बात सबने बंदर और मदारी का खेल कभी ना कभी देखा होगा इस खेल में जब बंदर की रस्सी किसी मदारी के हाथ में होती है... तो बंदर इशारों पर नाचता है। लेकिन अगर बंदर पर मदारी रस्सी की पकड़ मजबूत नहीं रखता तो बंदर भागता ही है, रस्सी भी साथ ले जाता है.. और बाद में मदारी केवल पछताता हैं। आखिर में एक बात जो पूरी तरह से सत्य है अतिक्रमण करना गलत है। लेकिन अर्श पर बैठे लोगों को छोड़कर फर्श पर बैठकर परिवार चलाने वालों की रोजी-रोटी छीना जाना भी सही नही कहा जा सकता है। अगर मंशा सही है तो जो लोग रसूख के दम पर मनमानी कर रहे हैं पहले उन पर कार्रवाई की जानी चाहिए। जिससे फर्श पर बैठकर परिवार चलाने वाले को रोजगार जाने का दुख इतना महसूस नहीं होगा...। शहर स्वच्छ हो सुंदर हो कार्रवाई हो पर कार्रवाई में दोगलापन नहीं दिखना चाहिए। जिससे कि लगे की गंगाधर हो या शक्तिमान मन मर्जी नहीं कर रहे हैं। और भले ही बंदर राज चले लेकिन लगे कि रस्सी मदारी के हाथ है। शहर में ऐसा नहीं लग नहीं रहा है क्योंकि या तो मदारी कमजोर है या फिर बंदर राजा डाकी है। करवाई पारदर्शी हो समान रूप से हो यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है।


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