चित्तौड़गढ़ - 10वीं शताब्दी में बने समिद्धेश्वर मंदिर को तोड़ने के लिए हुआ था मुस्लिमों का आक्रमण, जहां एक शिला पर बनी त्रिमूर्ति की आज भी होती है पूजा
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अखिल तिवारी

सीधा सवाल। चित्तौड़गढ़। ऐतिहासिक चित्तौड़ दुर्ग पर मुगलों के कई आक्रमण हुए, लेकिन कभी चित्तौड़ ने मुगलों का आधिपत्य स्वीकार नहीं किया था।मुगलों ने अपने आक्रमण में मंदिरों को भी काफी नुकसान पहुंचा था। यहां स्थित समिद्धेश्वर महादेव मंदिर पर चार आक्रमण हुए हैं। इनमें से एक आक्रमण तो केवल मंदिर और नवनिर्माण तोड़ने के लिए ही हुआ था, जो मुगल शासक ने किया था। इस आक्रमण में मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा। लेकिन बाद में मंदिरों का जीर्णोद्धार हुआ। यहां आज भी एक ही बड़ी शीला पर बने भगवान ब्रह्मा, विष्णु व महेश के स्वरूप की एक साथ पूजा होती है। यह त्रिमूर्ति भगवान की एक साथ बनी सबसे बड़ी प्रतिमा है, जो चित्तौड़ दुर्ग पर स्थापित है। यह मंदिर अपनी विशेषताओं के चलते भी अलग पहचान रखता है। इतिहास पढ़ने के बाद देश-विदेश के पर्यटक विशेष तौर पर दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर्व पर यहां अभिषेक सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।

कॉलेज शिक्षा से रिटायर्ड प्रोफेसर एवं इतिहासविद डॉ लोकेंद्रसिंह चुंडावत ने बताया कि एशिया के सबसे बड़े दुर्ग चित्तौड़ पर कई ऐतिहासिक भवन है। यह अपनी अलग विशेषताओं को लेकर है विश्व में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। दुर्ग पर 10वीं शताब्दी में बना ऐतिहासिक समिद्धेश्वर महादेव मंदिर भी इन भवनों में से एक है, जिसकी स्थापत्य कला देखते ही बनती है। इसका निर्माण मालवा के शासक राजा भोज परमार ने करवाया था। आज भी यह मंदिर चित्तौड़ दुर्ग पर आने वाले पर्यटकों एवं श्रद्धालुओं के दर्शन का मुख्य केंद्र रहता है। वैसे तो मुगलों की ओर से किए गए हर आक्रमण में दुर्ग के धार्मिक स्थलों को विशेष तौर पर निशाना बनाया गया था। इन हमलों में इस मंदिर पर भी तोड़-फोड़ की गई थी। लेकिन मुगलों का एक आक्रमण ऐसा भी था, जिसमें केवल मंदिर एवं नवनिर्माण को ही ध्वस्त करना मुख्य उद्देश्य था। चौथी बार हुए इस हमले में समिद्धेश्वर महादेव मंदिर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया गया था। डॉ चुंडावत ने बताया कि चौथी बार में हुए नुकसान के बाद इस मंदिर के पुनर्निर्माण में वर्षों का इंतजार करना पड़ा था। समिद्धेश्वर महादेव मंदिर में एक बड़ी शीला पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रिमूर्ति स्वरूप में दर्शन होकर पूजा होती है। सावन मास के अलावा महाशिवरात्रि पर भी विशेष अनुष्ठान होता है।

चौथे हमले में पहुंचा था सबसे ज्यादा नुकसान


चुंडावत ने बताया कि जब भी मुस्लिमों ने आक्रमण किया तब धार्मिक स्थलों को निशाना बना कर काफी तोड़फोड़ की थी। गुलाम वंश के शासक सुल्तान अल्तमस (शमसुद्दीन इल्तुतमिस) ने 13वीं शताब्दी में इस मंदिर को पहली बार निशाना बनाया। इसके बाद 14वीं शताब्दी में सन् 1303 में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग पर हमला किया था। तब भी दुर्ग के धार्मिक स्थलों पर काफी तोड़-फोड़ की गई थी। इसमें भी समिद्धेश्वर महादेव मंदिर निशाने पर था। वहीं 1567 में मुगल सम्राट अकबर ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया था। तब इस मंदिर को लगभग ध्वस्त कर दिया गया था।

शाहजहां काल में मंदिर ध्वस्त करने के लिए हुआ था हमला

 
डॉ लोकेंद्र सिंह चुंडावत ने बताया कि इस मंदिर पर अंतिम रूप में शाहजहां काल में आक्रमण हुआ था। यह आक्रमण केवल चित्तौड़ दुर्ग पर स्थित इस मंदिर और नव निर्माण को ध्वस्त करने के लिए ही था। 1651 में मुगल सम्राट शाहजहां काल में शार्दुल खान के नेतृत्व में मुगल सेना ने आक्रमण किया था और कई धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया था। इस हमले में भी काफी नुकसान पहुंचा और वर्षों तक इस मंदिर को जीर्णोद्धार के लिए इंतजार करना पड़ा।

मंदिर के जीर्णोद्धार होने के कारण हमला


चुंडावत ने बताया कि मेवाड़ मुगल संधि 1615 ईस्वी में हुई थी। इसमें चित्तौड़ दुर्ग को स्वतंत्र तो मान लिया था लेकिन दुर्ग पर पुनः निर्माण नहीं होगा, इस पर संधि हुई थी। लेकिन महाराणा जगत सिंह ने इस संधि को तोड़ते हुए दुर्ग पर मंदिरों का पुनर्निर्माण और नव निर्माण शुरू करवा दिया था। 1650 ईस्वी सन से पहले ही इस मंदिर का पुनर्निर्माण हो गया था। ऐसे में 1651 में मंदिर ध्वस्त करने के लिए मुगल सेना चित्तौड़ दुर्ग पर पहुंची थी।

मंदिर के निर्माण से पहले बनी कुंडली, प्रशस्ति भी लगी


डॉ चुंडावत ने बताया कि दुर्ग स्थित समिद्धेश्वर महादेव मंदिर अपनी कई विशेषताएं लिए हुए हैं। यह एक मात्र मंदिर होगा, जिसके निर्माण से पहले कुंडली बनी हो। वहीं इसकी प्रशस्ति (मंदिर के बारे में जानकारी) भी लगी हुई है। मंदिर परिसर में ही इसकी कुंडली लगी हुई है। इसके अलावा महाराणा कुंभा के समय मंदिर में प्रशस्ति लगाई गई थी। मुगलों के हमले के बाद ध्वस्त हुवे इस मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ तब भी इसकी कुंडली बनाई गई थी। यहां पहले प्रतिमा की स्थापना हुई और बाद में मंदिर का निर्माण हुआ। इसका कारण यह है कि एक ही बड़ी शीला को पर मूर्ति बना कर गर्भ गर्भ में स्थापित करना मुश्किल था। ऐसे में बड़े पत्थर पर पहले मूर्ति बनी, बाद में मंदिर का निर्माण हुआ।

दवाब में लाने के लिए धार्मिक बिंदुओं पर पहुंचाई चोट


चुंडावत ने बताया कि मेवाड़ के जो अधिपति थे वह भगवान शिव के पूजक थे। भगवान शिव मेवाड़ के राजा थे और महाराणा उनके दीवान थे। मुगलों का उद्देश्य था कि उनके धार्मिक जो प्रतिष्ठित बिंदु है उनको यदि नुकसान पहुंचाया जाएगा तो उनकी आत्मा को चोट पहुंचेगी। इसके दबाव से यह मुगलों के दबाव में आ सकते हैं। लेकिन मेवाड़ के शासक ऐसे नहीं थे। उन्होंने मंदिरों की पूरी रक्षा की और इसमें सफलता भी प्राप्त की। कोई तोड़फोड़ भी हुई तो उसे सही किया।

समिद्धेश्वर मंदिर के लिए दिया था जमीन का दान


चुंडावत ने बताया कि मालवा के शासक ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। बाद में गुजरात के शासक जयसिंह सिद्धराज ने चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया था। लेकिन उन्होंने दुर्ग के मंदिरों को नुकसान नहीं पहुंचा। उन्होंने समिद्धेश्वर महादेव मंदिर को भूमि का अनुदान भी दिया था, जिससे मंदिर की आय बढ़े।

विशेषताओं से होती है प्रतिमाओं की पहचान


समिद्धेश्वर महादेव मंदिर में भगवान शिव की अकेले पूजा नहीं होती। यहां ब्रह्मा विष्णु और महेश तीनों त्रिमूर्ति स्वरूप है। एक बार देखने से कोई भी व्यक्ति इन प्रतिमाओं में पहचान नहीं कर सकता की कौन सा मुख किस भगवान का है। मूर्तिकार ने प्रतिमाओं को इस तरह से उकेरा है कि उनकी विशेषताओं से पहचान होती है। एक मूर्ति बाल स्वरूप, दूसरी जवानी और तीसरी बुढ़ापे के रूप में भी दिखती है। भगवान ब्रह्मा के हाथ में शंख एवं एक हाथ में कमल का फूल है। वहीं भगवान विष्णु की प्रतिमा में सिर पर त्रिपुंड एवं कान में कुंडल है। वहीं नाक गले में नहीं होकर जमीन पर आ रहा है। वहीं सबसे आखिरी में भगवान शिव की प्रतिमा है, जिसमें कि उनके हाथ में खप्पर एवं गले में नाग है।


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