चित्तौड़गढ़ - भाड़ में जाए डेयरी का फायदा सिर्फ भ्रष्टाचार कायदा,बेलगाम हो रहा चित्तौड़गढ़ डेयरी का प्रबंधन
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चित्तौड़गढ़ - अजब बेबसी..बंदर और मदारी की रस्साकशी....!

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चित्तौड़गढ़ / कपासन - पुलिस थाना एवं ए एन्ट्रीएफ टीम की सयुक्त कार्यवाही मे एक बेलेनो कार, एक मोटर साईकिल से 36 किलोग्राम अफीम डोडा चूरा व 16 ग्राम एमडीएम मौली पाउडर जब्त

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चित्तौड़गढ़ - लकड़ियों से चला रहे भंडारा, हर दिन तीन हजार से ज्यादा ले रहे प्रसाद

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चित्तौड़गढ़ - लेन-देन के विवाद ने लिया खूनी रूप: रिपोर्ट देने जा रही महिला को कार से कुचलकर हत्या

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ठेकेदारों के फायदे के लिए बेच रहे दूध

सीधा सवाल। चित्तौड़गढ़। आमतौर पर रेवेन्यू रिकॉर्ड में संशोधन के लिए विधानसभा में प्रस्ताव रखे जाते हैं तब जाकर किसी स्थान का नाम परिवर्तित होता है। लेकिन चित्तौड़गढ़ डेयरी में भ्रष्टाचार की काली कमाई के लिए सैकड़ो किलोमीटर दूरी की जगह महज कुछ किलोमीटर के फासले पर स्थानांतरित हो गई है। 400 किलोमीटर दूर स्थित मध्य प्रदेश का शिवपुरी चित्तौड़गढ़ से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नगरी में स्थानांतरित हो गया। ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा खेल खेला जा रहा है जिस पर कार्रवाई की बात करना तो दूर डेयरी का प्रबंधन पर्दा डालने में जुटा हुआ है। ठेकेदार अधिकारियों कार्मिकों के लिए खेले जा रहे हैं इस खेल पर राजनीतिक पगड़ी भी बंधती प्रतीत हो रही है। एक बार फिर मध्य प्रदेश के लिए भेजा गया दूध चित्तौड़गढ़ जिला मुख्यालय के समीप खाली होने का मामला सामने आया है। सस्ती दरो दूध लेकर कम दूरी पर खाली कर मोटा मुनाफा कमाने का खेल खेलते हुए किसानों के हित के इस संस्थान को डूबने की पूरी कवायद की जा रही है। अब तो दैनिक रोजगार से जुड़े कार्मिकों में भी इस बात का डर घर करने लगा है कि यही स्थितियां चलती रही तो वह दिन दूर नहीं जब इकाई को घाटे में बता कर बंद कर दिया जाएगा। और जिन लोगों ने अपना पूरा जीवन इस संस्थान को पोषित करने में दिया है उनकी मेहनत पर पानी फिरता दिखाई दे रहा है।

दूध शिवपुरी का पहुंच नगरी, आखिर किसकी जिम्मेदारी

 
चित्तौड़गढ़ संयंत्र से वाहन संख्या आर जे 06 जीडी 3314 शिवपुरी मार्ग संख्या एक पर 100 कैरेट स्किम मिल्क लेकर निकला ₹7 रुपये 90 पैसे प्रति लीटर कमीशन की दर से यह दूध इस गाड़ी में भरा गया। यह गाड़ी नगरी के समीप जाकर खाली हो गई। और वहां से इस गाड़ी को इसके चालक ने चित्तौड़गढ़ के सहनवा मे लाकर खड़ी कर दी। इस मार्ग का वर्क आर्डर कवि शंकर आचार्य के नाम पर जारी किया गया है। जिस श्रेणी का दूध इस वाहन में भरा गया वह मावा बनाने के लिए उपयोग में लिया जाता है। सूत्रों के अनुसार इस दूध से जो इस मार्ग पर जा रहा है एक भी बार अपने गंतव्य पर नहीं गया है और प्रतिदिन लगभग 8 से 10000 रुपए ठेकेदार की जेब में जा रहे हैं। ऐसे पांच रूट बनाए गए हैं जो केवल ठेकेदार और उनको ठोका दिलवाने वाले प्रबंधन के अधिकारियों के लिए फायदे का सौदा है और इकाई को इससे सीधा-सीधा नुकसान है।

'गांधारी' या पुरानी फिल्मों की विलेन बनी प्रबंधक !


चित्तौड़गढ़ के किसानो की इस संस्था में चल रहा घटनाक्रम ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो या तो महाभारत के पात्र धरती पर उतर आए हैं या पुरानी फिल्मों में विलेन के किरदार निभाए जा रहे हैं। लंबे समय से ठेकेदारों के खटारा वाहन चलाने बिना पंजीकरण के टेंडर के विपरीत वाहन को संचालित करने के मामले सामने आ रहे हैं। जिन पर प्रबंधक प्रमोद चारण द्वारा बाकायदा लिखित आदेश निकालकर जुर्माना लगाने और पुनरावृत्ति होने पर ब्लैक लिस्ट करने के दावे किए गए थे। लेकिन ना तो उन जांच रिपोर्ट का कोई पता है बल्कि उन्ही ठेकेदारों ने पूल बनाकर ठेके ले लिए है। और सिर्फ परंपरागत रूप से डेयरी में जमे ठेकेदारों को फायदा हो सके इसके लिए टेंडर शर्तें भी इसी प्रकार की रखी गई की कोई दूसरा उन्हें पूरा न कर सके। ऐसे हालातो में लगने लगा है कि प्रबंधक चारण या तो महाभारत में कौरवों की माता गांधारी की तरह आंखों पर पट्टी बांधकर अंधी हो गई है या फिर कहीं ऐसा तो नहीं है की पुरानी फिल्मों में जब खलनायक का पात्र बनाया जाता था तो सार्वजनिक रूप से उसे ईमानदार दिखाया जाता था लेकिन वही पात्र सारे गलत कामों का मुखिया साबित होता था। जिसे राजनेताओं और बड़े अधिकारियों का संरक्षण मिला होता था। जिला कलेक्टर को प्रशासक नियुक्त किए जाने से किसानों के हित में निर्णय होगा इस बात की संभावना बन रही थी लेकिन ऐसा लगता है कि उच्च स्तर से राजनीतिक संरक्षण प्राप्त डेयरी के इन कर्ता धर्ताओ को जिला कलेक्टर के होने से भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।

देने वाला 'बद्रीनाथ'देने वाला 'बद्रीनाथ' बाकी सारा बंटाधार


ठेकेदारों की कमाई के लिए बनाए गए मार्ग ऐसे प्रतीत हो रहे हैं जैसे उत्तराखंड क्षेत्र में लोग कहते हैं कि देने वाला भी बद्रीनाथ है और लेने वाला भी बद्रीनाथ है। इन मार्गों पर जिन बूथों पर दूध दिया जा रहा है यदि उनकी जांच की जाए तो यह दूध विक्री के केंद्र इन्हीं ठेकेदारों के निकलेंगे जो वहां के नाम पर सस्ता दूध लेकर मुनाफा कमा रहे हैं। यानी कि ना तो कहीं दूध देना है ना कहीं से दूध बिकना है केवल कमीशन के खेल में जहां सरस महंगी दर पर दूध दे सकता है उन्हीं जगहों पर दो से तीन रुपए प्रति लीटर में दूध बेचकर अपनी जगह भर रहे हैं। क्योंकि स्थानीय और जिले में दूध परिवहन की दर एक रुपए 90 पैसे प्रति लीटर अधिकतम है। ऐसी स्थिति में ऊंची दर पर ठेका लेकर केवल किसानों को चूना लगाया जा रहा है। और इन ठेकेदारों के शरण दाताओं को मोटा कमीशन बंट रहा है। इससे लगने लगा है कि किसानों की डेयरी में आग लग रही है और जिम्मेदार नीरो बनकर भ्रष्टाचार की बांसुरी बजा रहे है।


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