चित्तौड़गढ़ - आसाम का मुख्य फेस्टिवल है बिहू उत्सव, हिन्दू नववर्ष पर होता है वृहद आयोजन
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चित्तौड़गढ़ / कपासन - पुलिस थाना एवं ए एन्ट्रीएफ टीम की सयुक्त कार्यवाही मे एक बेलेनो कार, एक मोटर साईकिल से 36 किलोग्राम अफीम डोडा चूरा व 16 ग्राम एमडीएम मौली पाउडर जब्त

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सीधा सवाल। चित्तौड़गढ़। जिला मुख्यालय पर आयोजित लिए जा रहे राष्ट्रीय स्वदेशी महोत्सव में देश के कई स्थानों से आए कलाकार भी अपनी प्रस्तुति दे रहे हैं।इन्हीं में से एक प्रस्तुति मंगलवार रात को आसाम के लोक कलाकारों ने दी है। आसाम से आए 11 सदस्यों के दल ने वहां के कई लोक नृत्यों की प्रस्तुति दी है। इसमें मुख्य रूप से लोक नृत्य बिहू उत्सव (बसंत) की प्रस्तुति रही है। यह लोक नृत्य आसाम में फेस्टिवल के रूप में घर-घर हिन्दू नववर्ष पर मनाया जाता है। प्रकृति के होने वाले बदलाव पर वृहद स्तर पर इसे मनाया जाता है। आसाम की वेशभूषा में लोक गीत पर हुई प्रस्तुति ने सभी का मन मोह लिया।

आसाम की लोक कला को आगे बढ़ा रही गुरु चीना राजकुमारी ने बताया कि यह उत्सव आसाम का मुख्य फेस्टिवल है। इसमें पहले खेत पर उत्सव मनाने प्रकृति के बीच जाते थे। इस समय होने वाले प्रकृति के बदलाव का उत्सव है। सात दिन चलने वाले उत्सव की शुरुआत गाय के लिए नृत्य होता है।

किसानों के जीवन में नई फसल का प्रतीक
गुरु जीना राजकुमारी ने बताया कि असम, भारत का सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से मनाया जाने वाला पर्व बिहू राज्य की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। बिहू का वसंतकालीन रूप रोंगाली बिहू या बोहाग बिहू के नाम से जाना जाता है, जो असमिया नववर्ष और वसंत ऋतु के आगमन का संकेत देता है। यह पर्व प्रायः अप्रैल के मध्य में पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
बिहू पर्व कृषि परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है और किसानों के जीवन में नई फसल के आरंभ का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर पूरे राज्य में लोकगीत, पारंपरिक वाद्य यंत्र और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। बिहू पर्व के दौरान प्रस्तुत किया जाने वाला बिहू नृत्य असम का प्रसिद्ध पारंपरिक लोकनृत्य है। यह नृत्य अपनी जीवंतता, ऊर्जा और आनंदमय भावों के लिए जाना जाता है, जो असम की कृषि जड़ों और सांस्कृतिक विरासत को प्रतिबिंबित करता है। बिहू नृत्य और पर्व मिलकर असम की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को देश-दुनिया के सामने प्रस्तुत करते हैं।

लोक कला को वैश्विक पहचान दिलाने में गुरु जीना राजकुमारी का योगदान
असम की लोक संगीत और लोक नृत्य परंपराओं की प्रख्यात साधिका गुरु जीना राजकुमारी ने अपना संपूर्ण जीवन क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित किया है। वह विदेश मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की पैनल कलाकार हैं और अपने शोध कार्य के लिए संस्कृति मंत्रालय से जूनियर एवं सीनियर फेलोशिप भी प्राप्त कर चुकी हैं। गुरु जीना राजकुमारी ने अब तक कई विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दिया है, जिनमें से अनेक छात्रों को सांस्कृतिक स्रोत और प्रशिक्षण केंद्र (CCRT) द्वारा राष्ट्रीय छात्रवृत्ति से सम्मानित किया गया है। उनकी शिक्षण पद्धति और मार्गदर्शन से नई पीढ़ी को असमिया लोक परंपराओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान मिला है।
प्रस्तुतियों, कार्यशालाओं और प्रकाशनों के माध्यम से उन्होंने असमिया लोक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया है। वह मलेशिया, फिलीपींस, नेपाल, भूटान, यूनाइटेड किंगडम, थाईलैंड और बांग्लादेश सहित कई देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं।
अपने समर्पित कलाकारों की टीम के साथ उनकी आगामी प्रस्तुति को लेकर कला प्रेमियों में खास उत्साह है।


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