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सीधा सवाल। राशमी। पितृजन जल के माध्यम से अपने प्रिय जनों की श्रद्धा चाहते हैं, तृप्त पितृ ही वंशवृद्धि में सहायक सिद्ध होते हैं। उक्त विचार सनातन हिंदू धर्म जागरण पदयात्रा के 14 वे पडाव में जाडाना में आयोजित पांच दिवसीय संस्कार भागवत कथा एवं 108 सामूहिक तुलसी विवाह के तृतीय दिवस पर गरुड़ पुराण के अनुसार जीव की गति का वर्णन करते हुए गौ भक्त संत राधेश्याम सुखवाल ने व्यक्त किए। धर्म सभा को संबोधित करते हुए सुखवाल ने कहा कि जीवात्मा शरीर छोड़ते ही प्रेतसंज्ञक नाम से जानी जाती है, उसके 1 वर्ष बाद पितृ गति में गतिमान होती है एवं कर्मानुसार देव, पुनर्जन्म या मोक्ष गति करती है ।
पुत्र का धर्म और दायित्व है कि वह अपने पितृजनों को समय-समय पर तृप्त करने के लिए तील मिश्रित जल का दान करें एवं विधि से जलतर्पण करें ।
वर्तमान समय में श्राद्ध और जलतर्पण के प्रति अश्रद्धा के कारण ही घर-घर में पितृदोष व्याप्त हो रहा है। इसी कारण से घरों में अशांति एवं तनाव व्याप्त है ।
संत ने कहा कि तीर्थ यात्रा के दौरान पवित्र नदियों ,सरोवर में स्नान करते समय अपने पितृ जनों को जलदान अवश्य करना चाहिए।
इस दौरान सभी यजमान जोड़ो द्वारा पितृपूजन एवं जलतर्पण के पश्चात पितरों की आरती एवं मोक्ष हेतु प्रार्थना की गई। तथा पितृ तर्पण करने वाले परिजनों की ओर से कथा में पधारे सभी श्रद्धालुओं के लिए ब्रह्मभोज का आयोजन किया गया।
पितृ पूजन के अवसर पर श्यामलाल सुखवाल एवं परिवार की ओर से ग्यारह हजार का सहयोग कर सभी को भोजन प्रसादी का कराई गई ।