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जो राम का नहीं वह काम का नहीं - अर्जुन लाल जीनगर
सीधा सवाल। कपासन। राजमार्ग के निकट स्थित प्राचीन शक्तिपीठ मुला माता मंदिर पर दस दिवसीय चैत्र नवरात्रि मेला संपन्न हो गया। मेले का समापन 51 फीट ऊंचे रावण के पुतले के दहन, शानदार आतिशबाजी और बगड़ावत के मंचन के साथ हुआ। इस अवसर पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़े।समापन समारोह में शनिवार रात्र दस बजे के बाद भव्य आतिशबाजी की गई। इसके बाद मुख्य अतिथि विधायक अर्जुन लाल जीनगर, पूर्व विधायक बद्रीलाल जाट और भाजपा नगर मंडल अध्यक्ष राज विजयवर्गीय सहित अन्य अतिथियों ने 51 फीट के रावण के पुतले का दहन करवाया।इस अवसर पर विधायक जीनगर ने कहा की जो राम का नहीं, वह किसी काम का नहीं। सनातन की सरकार रहेगी तो आप सबका अस्तित्व रहेगा। सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास बना रहे।उन्होंने मेले के सफल आयोजन के लिए विकास समिति के सत्य नारायण आचार्य, राकेश आचार्य और उनकी पूरी टीम की प्रशंसा की।विकास समिति के अध्यक्ष सत्य नारायण आचार्य ने मेले के सफल संचालन के लिए सभी सहयोगकर्ताओं, भामाशाहों और पुलिस प्रशासन का आभार व्यक्त किया। आचार्य ब्राह्मण समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष देव किशन आचार्य और भेरू लाल लाखोला भी अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।मेला समिति के सदस्य राकेश आचार्य ने बताया कि समापन समारोह में कस्बे सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से हजारों की संख्या में मेलार्थी पहुंचे।रावण दहन के उपरांत शनिवार रात्रि को मेला रंगमंच पर बालू राम एंड पार्टी द्वारा बगड़ावत का मंचन किया गयाजिसका दर्शकों ने खूब आनंद लिया।दस दिनों तक चले महाभंडारे में भी हजारों श्रद्धालुओं ने महाप्रसाद ग्रहण किया। मेलार्थियों की सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया था। मेले में लगे चकरी और डॉलर झूलों का बच्चों व युवाओं ने खूब आनंद लिया। जबकि सेल्फी प्वाइंट के रूप में बनाया गया एयरप्लेन विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। दस दिवसीय मेले के अंतिम दिन मूला माता मंदिर से दो किलोमीटर राजमार्ग तक वाहनों की कतारे लगी रही। बार बार लग रहे जाम को व्यवस्थित करने के लिए पुलिस प्रशासन को अच्छी खासी मस्कत करनी पड़ी। मेले के अंतिम दिन मूला माता विकास समिति द्वारा जन सहयोग से संचालित भंडारा देर रात्रि तक संचालित रहा। हजारों की संख्या में माता रानी के भक्तों ने मेले के अंतिम दिन प्रसाद ग्रहण किया। दस दिनों तक संचालित महा भंडारे के दौरान लकड़ी से तीन चूलहो पर लगातार भोजन व्यवस्था का लगातार कार्य निर्मित होता रहा।