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लॉटरी के जरिए हो रही बिक्री, मूलभूत सुविधाओं का अभाव
सीधा सवाल। चित्तौड़गढ़। जिले में लगातार कृषि भूमि पर बिना स्वीकृति के भूखंड बेचे जाने की जानकारियां सामने आ रही है। हालत यह है कि बड़े पैमाने पर लोगों को उपहार योजना के नाम पर बड़ी संख्या में भूखंड बेच दिए गए हैं। यह कागजी चंद्रनगर धरातल पर और सरकारी रिकॉर्ड में कहीं पर भी दर्ज नही है। केवल एक कृषि भूमि को बिना स्वीकृति के नक्शा बनाकर लगभग 400 से अधिक भूखंड बेचे जा रहे हैं जिनमें से 95% भूमि विक्रय कर दी गई है। गंगरार तहसील क्षेत्र में स्थित इस भूमि में हक हस्तांतरण के जरिए रजिस्ट्री करवा कर भूमि बेची जा रही है जिसे लॉटरी में उपहार योजना के जरिए कॉलोनी का नाम दिया गया है।
केवल कागजी है 'चंद्रनगर'
खरीददारों को झांसे में लेने के लिए यूआईटी के पेराफेरी क्षेत्र में यह कागजी चंद्रनगर नाम की कॉलोनी दर्शायी गयी है। जबकि वास्तविकता यह है कि इस नाम की कोई भी कॉलोनी चंदेरिया अथवा पंचायत समिति या ग्राम पंचायत में पंजीकृत ही नहीं है। केवल एक आभासी नक्शा बनाकर उस पर भूखंड और सड़क दिखाई गई है। जबकि यदि इसके अवैध नक्शे को देखा जाए तो इसमें कोई भी सामुदायिक उपयोग की भूमि नहीं छोड़ी गई है। जो नक्शा लोगों को दिखाया जा रहा है। ना तो वह पंचायत से स्वीकृत है ना नगर परिषद और ना ही यूआईटी से इसके लिए कोई स्वीकृति ली गई है। और तो बड़ी बात यह है कि इस कथित चंद्र नगर में भूमि बेचने के लिए उपहार योजना का भी लॉटरी के माध्यम से झांसा दिया जा रहा है जबकि वास्तविकता यह है कि राजस्थान में लॉटरी पर पूरी तरह से रोक लगी हुई है। ऐसी स्थिति में यह कागजी चंद्रनगर केवल झाँसेबाजी और ठगी का प्रयास है।
स्थानीय निकायों की नहीं है कोई आवश्यकता ?
सुंयोजित नगर विकास और मास्टर प्लान के अनुरूप निर्माण कार्यों को लेकर कृषि भूमि का कॉलोनाइजर आवासीय अथवा व्यावसायिक भू उपयोग परिवर्तन करवाते हैं इसके लिए मोटी राशि खर्च होती है। लेकिन जिस तरह की स्थितिया चित्तौड़गढ़ में दिखाई दे रही है उसे लगने लगा है कि यहां ऐसी कोई स्वीकृति या परिवर्तन आवश्यक नहीं है। मूलभूत विकास के लिए और सुनियोजित नगर विकास के लिए ग्राम पंचायत पंचायत समिति नगर परिषद और नगर निकाय में नगर विकास न्यास से कॉलोनी का पंजीकरण और स्वीकृति करनी होती है। जिससे कि भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए सड़क विद्यालय या अन्य सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित भूमि का परिवर्तन नहीं हो पाए। लेकिन सामने आ रही स्थितियों से लगने लगा है कि केवल कृषि भूमि पर मनमाने तरीके से बिना स्वीकृति का नक्शा लगाकर लॉटरी के माध्यम से यदि भूमि बेची जा सकती है और उसे कॉलोनी का दर्जा दिया जा सकता है तो फिर कोई भी कृषि भूमि बिना रूपांतरण के कोई भी व्यक्ति बेच सकता है। और ऐसी परिस्थितियों में सुनियोजित नगर विकास के दावे और उनके नियमों की पालना कराने के लिए जिम्मेदार संस्थाएं केवल औपचारिक है और जब मनमर्जी चरम पर है तो ऐसा लगने लगा है कि ऐसी संस्थाओं की कोई आवश्यकता नहीं है। फिर चाहे वह ग्राम पंचायत हो नगर परिषद हो या नगर विकास न्यास किसी भी संस्था की ना तो कोई आवश्यकता है और नहीं उसकी स्वीकृति का कोई लेना-देना है।
कार्रवाई के लिए सब जिम्मेदार पर करें कौन ?
इस प्रकार की स्थिति में कार्रवाई करने के लिए सबसे पहले तहसीलदार उसके पश्चात ग्राम पंचायत उपखंड अधिकारी स्थानीय निकाय में यूआईटी नगर परिषद कार्रवाई करने के लिए अधिकृत है। लेकिन उसके बावजूद लगभग 400 से अधिक भूखंड की इस अवैध कॉलोनी के बारे में जिम्मेदारों को जानकारी नहीं होना यह साबित करता है कि ऐसे मामले में कोई भी कार्यवाही नहीं करना चाहता है फिर भले ही सरकार और आमजन दोनों का नुकसान हो रहा हो। ऐसी स्थिति में यह भी एक बड़ा सवाल है कि ऐसी कितनी कॉलोनिया है जिनमें इस तरीके से भूखंड बेचे जा रहे है। और क्या जिम्मेदार ऐसे मामले में कोई कार्रवाई कर पाएंगे।
सफेदपोश है इस अवैध कारोबार के भागीदार
सूत्रों का कहना है कि यह लॉटरी के माध्यम से कृषि भूमि बेचने का अवैध कारोबार केवल चित्तौड़गढ़ जिला मुख्यालय नहीं बल्कि बस्सी निंबाहेड़ा सहित पैराफरी और जिले के कहीं निकायों में किया जा रहा है। मुख्यालय पर कागजी चंद्रनगर की बात की जाए तो सूत्रों के अनुसार नियमों की पालना करवाने वाले सफेदपोश इसमें हिस्सेदार हैं। और ऐसी स्थिति में जब बाड़ ही उठकर खेत को खाने लगे तो आमजन के अधिकारों और सुनियोजित नगर विकास की बात सोचना भी बेमानी है।