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सीधा सवाल। डूंगला / चिकारड़ा। सकारात्मक सोच एक स्वर्ग की सीढ़ी का पायदान है। जहां बिना सोचे समझे चढ़ा जा सकता है। एक अकेली सकारात्मक सोच आपके जीवन में विकास और मिठास के ढेर सारे द्वार खोलती है।।उन्होंने सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना जैसीं कला का उल्लेख किया । उक्त बात संत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर जी महाराज ने प्रवचन के दौरान कहा। वही बताया
कि दूसरों से ऐसा व्यवहार कीजिए, जो हम दूसरों से पाना चाहते हैं। आखिर तलवार की कीमत धार से होती है और इंसान की कीमत व्यवहार से। जो काम आप आज कर सकते हैं, उसे कभी भी कल पर न टालें। जो यह कहते हैं कि मैं यह काम फिर किसी दिन कर लूँगा, तो इसका मतलब है कि यह काम उनके भरोसे तो नहीं होगा। याद रखें, जो हालात का सही ढंग से सामना कर सकते हैं, जो व्यवहार में बड़प्पन दिखाते हैं, अप्रिय व्यवहार पर बुरा नहीं मानते, जो खुशियों पर काबू रखते हैं, कठिनाइयों को अपने पर हावी नहीं होने देते, जो तुक्के से मिली सफलता की बजाय काबिलियत और बुद्धि से मिली कामयाबी पर खुश होते हैं और जो अच्छे-बुरे में चुनाव करना जानते हैं, वे ही सही अर्थ में शिक्षित और सफल हैं। बेहतर होगा कि हम अपने हर दिन की शुरुआत किसी अच्छे विचार को पढऩे या सुनने से करें। सुबह का यही विचार दिन में हमारे व्यवहार में भी प्रगट होगा।
राष्ट्र-संत सोमवार को डूंगला के मुख्य बाजार में भाणावत निवास पर आयोजित प्रवचन और सत्संग में जीने की कला पर श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। संतप्रवर ने कहा कि सकारात्मक नज़रिये से कार्य-क्षमता में वृद्धि तो होती ही है वही मिल-जुलकर काम करने की उत्सुकता भी बढ़ती है। इसके साथ रिश्तों में बेहतरता आती है । तनाव से बचाव होता है। व्यक्तित्व तथा भाषा का विकास होता है । मानव को अपने जीवन मे नकारात्मक नामक बीमारी को पास में भी नहीं आने देना चाहिए । जिसमें इस बीमारी से दूरी बनाए रखी वह जीवन में सफलता की सीढ़ी चढ़ जाता है उन्होंने बोलने की कला सिखाते हुए कहा कि हमारे करियर में चेहरे की खूबसूरती की भूमिका दस प्रतिशत होती है, वही वाणी की नब्बे प्रतिशत तक होती है। इस विषय को लेकर संत कई उदाहरण देकर इस भाषा को परिभाषित किया कि वाणी और सकारात्मक सोच ही मानव जीवन जीने की एक कला है । जिसके सहारे मानव जीवन रूपी नय्या को पार लगती है। संत ने उदाहरण के तौर पर सास बहू का व्यावसायि ग्राहक का उदाहरण पेश किया । वही बताया कि किसी भी रिश्ते के टूटने के पीछे धन, दौलत, जमीन-जायदाद का काम रहता है । तो कड़वी जबान का हाथ ज्यादा हुआ करता है। व्यक्ति कड़वी जबान का सही उपयोग करके भी टूटे रिश्तों को सांध सकता है । और बिगड़े माहौल को अपने अनुकूल बना सकता है।
यहा यह बतादे की शब्दों में बड़ी जान होती है। इन्हीं से आरती, अरदास और अजान होती है। और यही धर्म के प्रति साधना पैदा करते हैं । बोलने की कला राम से सीखे जहाँ रावण ने कड़क जबान से अपने सगे भाई विभीषण को खो दिया, वहीं राम ने मीठी जबान से दुश्मन के भाई को भी अपना बना लिया। अगर द्रोपदी भी दुर्योधन पर 'अंधे का बेटा अंधा' कहने का व्यग्ंय बाण न छोड़ती तो शायद न उसका चीरहरण होता न महाभारत का युद्ध छिड़ता। इससे पूर्व डॉ मुनि शांति प्रिय सागर महाराज ने सभी उपस्थित समाजजन को मंत्र उच्चारण करवाते हुए जियो ओर जीने दो भजन गुनगुनाया। इस अवसर पर साध्वी चिंतन श्री ने भी सभा को संबोधित किया।
कार्यक्रम में जैन समाज के साथ, राजस्थानी समाज, मारवाड़ी समाज के श्रद्धालु भाई-बहनों ने भाग लिया।
राष्ट्रसंतों ने डूंगला से प्रस्थान करके वे मंगलवार को मेनार पहुंचें। वहां से 20 फरवरी को उदयपुर पहुंचेंगे जहां पर सेक्टर 4 स्थित विद्या निकेतन स्कूल में शुक्रवार से रविवार प्रातः 9:00 बजे से 11:00 बजे तक 3 दिन की विराट सत्संग प्रवचन होंगे। आयोजित प्रवचन में डूंगला के अनेक समाजजन भाग लेंगे।