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पहली आंधी ने उड़ा दिए दावों के तार, दो दिन से बिजली के लिए तरस रहे हजारों लोग
सीधा सवाल।सुमेरपुर। कैबिनेट मंत्री के गृह क्षेत्र सुमेरपुर में बिजली व्यवस्था पूरी तरह चरमराती नजर आ रही है। पहली आंधी, बारिश और तेज हवाओं के बाद शहर के कई हिस्सों में पिछले 48 घंटे से बिजली आपूर्ति ठप पड़ी है। भीषण गर्मी के बीच हजारों लोग अंधेरे में रातें काटने को मजबूर हैं, जबकि जिम्मेदार तंत्र हालात संभालने में असहाय दिखाई दे रहा है।शहर में स्थिति इतनी खराब हो गई कि रविवार देर रात तक लोगों का सब्र जवाब दे गया। विभिन्न मोहल्लों में नागरिक घरों से बाहर निकल आए और बिजली विभाग के खिलाफ खुलकर विरोध जताया। कई जगहों पर विभागीय कर्मचारियों का घेराव किया गया तथा तत्काल बिजली बहाली की मांग उठी।लोगों का आरोप है कि एक ओर पूरा शहर बिजली संकट से जूझ रहा था, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार अधिकारियों के मोबाइल फोन बंद या पहुंच से बाहर रहे। इससे लोगों में नाराजगी और अधिक बढ़ गई। नागरिकों का कहना है कि जब संकट की घड़ी में अधिकारी ही उपलब्ध नहीं हों तो आम जनता अपनी समस्या लेकर आखिर जाए तो कहां जाए।
-आधा शहर रोशन, आधा शहर अंधेरे में
सबसे बड़ा सवाल यह है कि शहर के कुछ हिस्सों में बिजली आपूर्ति बहाल हो गई, जबकि कई क्षेत्रों में 48 घंटे बाद भी अंधेरा कायम है। इस असमान व्यवस्था ने लोगों में भेदभाव और लापरवाही को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
जनता पूछ रही
—पहली बारिश में ही क्यों बैठ गया पूरा सिस्टम?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि पहली ही आंधी और बारिश में बिजली तंत्र जवाब दे जाए तो पूरे मानसून में हालात क्या होंगे? करोड़ों रुपये के रखरखाव और सुधार कार्यों के दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर व्यवस्थाएं धराशायी क्यों हो गईं?
जनप्रतिनिधियों और विभाग पर उठे सवाल
बिजली संकट को लेकर लोगों ने जनप्रतिनिधियों और बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। नागरिकों का कहना है कि विकास और बेहतर सुविधाओं के दावों के बीच दो दिन तक अंधेरे में डूबा शहर व्यवस्थाओं की वास्तविक तस्वीर सामने ला रहा है।
जनता की मांग
48 घंटे की बिजली बाधित रहने की उच्चस्तरीय जांच हो।
जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
क्षतिग्रस्त लाइनों और ढांचे को तत्काल दुरुस्त किया जाए।
मानसून से पहले बिजली व्यवस्था को मजबूत बनाने की ठोस कार्ययोजना सार्वजनिक की जाए।
सुमेरपुर का बिजली संकट अब केवल तकनीकी खराबी का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, आपदा प्रबंधन की तैयारी और आम जनता को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की क्षमता पर बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है।