चित्तौड़गढ़ - गर्ग रवाना, कर्मों का हिसाब कब ! ,अवधि पार नियम विरुद्ध नियुक्ति का मामला
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चित्तौड़गढ़ / कनेरा - खेत की झोपड़ी पर गिरी आकाशीय बिजली, दादा-दादी और पोते की मौत; फसल की रखवाली करने गए थे तीनों

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जाने से पहले बिठा दिया ठेकेदारों का जुगाड़

सीधा सवाल। चित्तौड़गढ़। जिला मुख्यालय के बोजुंदा में संचालित सहकारिता के बड़े उपक्रम सरस डेयरी में नियम विरुद्ध होने वाले कारनामे की लगातार पोल खुलने के बाद अब डेयरी प्रबंधन ने जिला प्रशासन को शिकायत मिलने के बाद मार्केटिंग मैनेजर अवधि पार नियम विरुद्ध तरीके से लगाए गए अरविंद गर्ग को हटा दिया है। जानकारी में सामने आया है कि इनका चार्ज प्लांट मैनेजर को दिया गया है। इसी बीच गर्ग की रवानगी से पहले पुराने खटारा वाहन लगाने वाले ठेकेदारों को कार्रवाई के बदले इनाम देने की पूरी तैयारी गर्ग के मार्गदर्शन में एमडी प्रमोद चारण की स्वीकृति से पूरी कर ली गई है। जिन ठेकेदारों की अनियमितता को सीधा सवाल ने उजागर किया था उन्हें ठेके मिले ऐसी तैयारी करते हुए टेंडर निकाल दिए गए हैं। साथ ही मोबाइल पार्लर के नाम पर डेयरी को हुए नुकसान की भरपाई को लेकर भी स्थिति साफ नहीं है। ऐसी स्थिति में सवाल यह है कि आखिर गर्ग के कार्यकाल में डेयरी को हुए नुकसान की भरपाई किस प्रकार की जाएगी। सहकारिता विभाग, डेयरी विभाग और जिला प्रशासन गर्ग के कारनामों की कटौती और नुकसान की वसूली करने में कोई कार्रवाई करेगा या फिर कारनामे करते हुए नुकसान को अंजाम देने वाले गर्ग की रवानगी के साथ ही इसकी वसूली भी रुक जाएगी। इसी के साथ टेंडर प्रक्रिया में मनमाने नियम बना कर ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने की प्रक्रिया पर भी रोक लग पाएगी यह भी एक बड़ा सवाल है।

गए गर्ग नियमों पर सवाल!

चित्तौड़गढ़ डेयरी में वर्तमान में सप्लाई के लिए टेंडर निकाले गए हैं। बिना पंजीकरण के खटारा वाहन चलाने को लेकर प्रबंधक प्रमोद चारण द्वारा दावा किया गया था कि बिना स्वीकृति के वाहन चलाने वाले ठेकेदारों से जुर्माना वसूलकर उन्हें ब्लैकलिस्टेड किया जाएगा, लेकिन जिस तरह के टेंडर निकालकर जो शर्तें जोड़ी गई है उससे साफ है कि ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए ही पूरी प्रक्रिया की जा रही है। इस मामले में गर्ग की मिली भगत को लेकर जिला प्रशासन को जनसुनवाई में शिकायत भी दर्ज करवाई गई थी। कई ऐसे नियम बनाए गए हैं जिनका सीधा फायदा वर्तमान में काम कर रहे चार ठेकेदारों को होगा। या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो दूसरा कोई ठेकेदार इन चारों के अलावा टेंडर भर ही नहीं सकता है ऐसी शर्ते जोड़ी गई है। ऐसे में यह लगने लगा है कि प्रबंधक संचालक प्रमोद चारण पर्दे के पीछे से इस पूरे खेल को चला रहीं है और साथ ही यह भी चर्चा है कि पूर्व में डेयरी से जुड़े रहे कार्मिक और जनप्रतिनिधि अपने फायदे के लिए प्रमोद चारण को शह दे रहे हैं।

पहले गया कोर्ट में मामला, बदले नियम, दोबारा मनमानी

टेंडर प्रक्रिया के दौरान ऐसे कई नियम जोड़े गए हैं जो ना तो तकनीकी रूप से सही है और ना ही व्यवहारिक रूप से संभव है। हालांकि जिला प्रशासन को शिकायत होने के बाद एकाध नियम में बदलाव किया गया है। लेकिन अभी भी ऐसे नियम टेंडर शर्तो में है जिनका फायदा चार ठेकेदारों को होगा और अंततोगत्वा इसका नुकसान डेयरी को उठाना पड़ेगा। उदाहरण के लिए एक निश्चित मात्रा में दूध परिवहन की शर्त टेंडर में डाली गई है यानी कि जिसको इससे कम मात्रा का अनुभव है वह अयोग्य है। इसी के साथ राज्य के बाहर जाने वाले दूध को लेकर एक रियायत दी गई है कि डेयरी से बाहर दूध निकालने के बाद यह ठेकेदार कहीं पर भी दूध बेचे उसे लेना-देना नहीं है लेकिन भुगतान ऊंची दरों पर होगा। इससे साफ है कि मंशा उत्पादन बढ़ाना या लाभ कमाना नहीं है बल्कि सीधा-सीधा ठेकेदारों को फायदा पहुंचने का है।

करना था ब्लैकलिस्टेड पहुंचा रहे फायदा!

सीधा सवाल द्वारा खटारा गाड़ी लगाने, चित्तौड़गढ़ में पंजीकृत वाहनों को भीलवाड़ा चलाने के संदर्भ में दस्तावेजों के साथ खबरों का प्रकाशन किया गया था। इसे लेकर प्रबंधक संचालक प्रमोद चारण द्वारा दावा किया गया था की जांच के बाद इनसे वसूली की जाएगी और ब्लैक लिस्ट किया जाएगा। लेकिन वर्तमान में जो टेंडर निकाले गए हैं उनका फायदा फर्म कविशकर आचार्य, ओम प्रकाश जाट, पप्पू लाल जाट, राजेश काकड़ा जैसे पहले से काम कर रहे ठेकेदारों को होगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इन फार्मो द्वारा गत वर्ष काम करने के दौरान नियमों को बाईपास किया गया था जिसके समाचार प्रकाशित हुए, लेकिन जांच रिपोर्ट का और वसूली की कोई अधिकृत जानकारी नहीं है। इससे साफ है कि मार्केटिंग मैनेजर रहे अरविंद गर्ग ने अपने अनुभव का फायदा ठेकेदारों को पहुंचा दिया है। और इसी के साथ यह भी प्रतीत होने लगा है कि जो वसूली के आदेश निकल गए थे वह भी केवल कोरी धमकी थी जिससे कि ठेकेदारों पर दबाव बनाया जा सके। यहां यह भी बता दे की सभी ठेकेदार पूर्व में डेयरी के अध्यक्ष रहे एक जनप्रतिनिधि के बेहद करीबी है। चर्चा यह भी है कि वर्तमान अध्यक्ष केवल औपचारिक है उनके स्थान पर इस पूरी इकाई का संचालन पर्दे के पीछे से किसी अन्य जनप्रतिनिधि द्वारा किया जा रहा है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि पूरा मामला गंभीर है और ऐसे में बिना प्रशासनिक कमेटी और जिला स्तरीय लेखा अधिकारी की भूमिका के टेंडर प्रक्रिया करवाने से नुकसान होगा इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। अब देखने वाली बात होगी लगातार शिकायत के सामने आने के बाद जिला प्रशासन किसानों के हित में क्या निर्णय ले पाता है।

पहले कोर्ट की दखल के बाद बदले गए थे नियम

जानकारी में यह भी सामने आया कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को खत्म करने के लिए पूर्व में भी ऐसे नियम जोड़े गए थे लेकिन कुछ लोग मामले को लेकर न्यायालय में पहुंच गए थे इसके बाद नियमों में बदलाव किया गया था इस बार फिर ऐसे नियम जोड़े गए हैं। इससे साफ है कि लंबे समय से डेयरी में नियमों से खिलवाड़ का खेल चल रहा है। और इस पर रोक लगाना आवश्यक प्रतीत होने लगा है।


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