चित्तौड़गढ़ - आधुनिकता के दौर में भी परंपरा जीवित: चित्तौड़गढ़ के आजोलिया का खेड़ा गांव में 60 साल से हो रहा रामलीला मंचन
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सीधा सवाल। चित्तौड़गढ़। आज के आधुनिक युग में डिजिटल दुनिया और तकनीक से कोई भी अछूता नहीं। इसके कारण आज छोटे छोटे गांव तक इसका असर दिख रहा है। इससे लोग पुरानी परंपराओं और आयोजनों से दूर होते जा रहे हैं। इस दौर में भी चित्तौड़गढ़ जिले में एक गांव ऐसा भी है जहां 60 सालों से ग्रामीणों की और से राम लीला का अनूठा मंचन जारी है। रामलीला के मंचन की लेकर छोटे से लेकर बड़ों तक में उत्साह दिखाई देता है। सभी इससे जुड़ कर आयोजन को सफल बनाने में लगते हैं। करीब 11 दिन तक चलने वाला यह आयोजन सर्व समाज को आपस में जोड़ कर रखता है तथा ऊंच नीच के भेद को भी मिटाता है।


चित्तौड़गढ़ जिला मुख्यालय से करीब दस किलोमीटर दूर बेगूं विधानसभा का आजोलिया का खेड़ा गांव है। ग्राम पंचायत मुख्यालय होने के साथ ही यहां की आबादी चार हजार से अधिक है तथा जिंक उद्योग नजदीक होने से शहरी कल्चर का भी असर दिखता है। इस गांव में करीब 60 साल से रामलीला का मंचन हो रहा है। नवरात्र महोत्सव के तीन दिन पहले ही राम लीला का मंचन गांव में स्थित बालाजी मंदिर पर होता है। रामलीला मंडल आजोलिया का खेड़ा के बैनर तले होने वाले इस आयोजन की बड़ी बात यह कि इस मंचन में सभी पात्र या कलाकार गांव के लोग ही होते है। जब से रामलीला का मंचन शुरू हुआ तब से लेकर आज तक इसी प्रकार मंचन हो रहा है। इस बार बाबूलाल जाट के निर्देशन में रामलीला का मंचन जारी है। इस आयोजन की बड़ी खास बात यह भी है कि सर्व समाज के लोग इसमें पात्र बन कर अपनी भूमिका का निर्वहन करते हैं। किसी भी प्रकार का ऊंच नीच का भेद दिखाई नहीं देता। 


पहले बांस की बल्लियों पर पर्दा, अब एलईडी स्क्रीन


एक समय यहां पर बांस की बल्लियों पर पर्दा लगा कर उसके आगे मंचन होता था। वहीं अब आधुनिकता का भी असर दिखा है। माइक लगे हैं तथा एलईडी स्क्रीन के आगे मंचन होता है। दो माह पहले रामलीला मंचन की तैयारियां शुरू कर दी जाती है। जो कलाकार होते है उनके ड्रेस सिलने के ऑर्डर दिए जाते हैं। जो भी सामग्री नई खरीदनी होती है वह यूपी के मथुरा से लेकर आते हैं। 


आठ से 60 साल तक के भूमिका, नौकरी पेशा भी


यहां रामलीला का मंच छोटे बच्चे और युवाओं को भी आगे बढ़ने की सीख देता है। कम उम्र में ही बच्चों को मंच मिल जाता है। इस बार यहां 60 साल की आयु से लेकर आठ साल के बच्चे तक राम लीला मंचन में जुटे हैं। 57 साल के शंकर तेली राजा जनक की भूमिका निभा रहे हैं। शंकर तेली की सास का गत दिनों हो गया था तब भी वे रात को यहां आकर रामलीला के मंचन को जारी रखा। वहीं आठ साल के बालक वानर सेना की भूमिका में रहते हैं। वहीं किसान, मजदूर से लेकर नौकरी पेशा तक कलाकार बन रहे हैं। केवल नृत्य करने वाले तथा वाद्य यंत्र बजाने वाले ही से बुलाते हैं।


कलाकार स्वयं उठाते खर्च, मंदिर का भी कर रहे विकास


इस रामलीला के मंचन में बड़ी बात यह है कि ग्रामीण चन्दा एकत्रित नहीं करते। प्रत्येक कलाकार स्वयं 2500 से तीन हजार रुपए हर साल देता है। आरती एवं व्यास पीठ पर भी चढ़ावा आता है। इसी से अगले साल के लिए राशि अलग निकालते हैं। इसके बाद जो राशि बचती है, उससे मंदिर का विकास करते हैं। पहले छोटा मंदिर था, वहां इसे बड़ा बना कर मार्बल का फर्श लगा दिया। वहीं रामलीला मंचन के लिए स्टेज भी तैयार कर दिया।


सौहार्द और सद्भाव की भी है मिसाल


रामलीला मंचन के बाद रात करीब 12 बजे सभी कलाकार और सहयोगियों का सामूहिक भोजन भी होता है। यह भोजन सार्वजनिक स्थान पर नहीं बनाया जाता। प्रतिदिन अलग-अलग कलाकार के घर से भोजन बन कर आता है। इससे सभी में जातिय सद्भाव दिखता है। बगैर किसी भेदभाव के सभी एक साथ रामलीला के समापन के बाद प्रतिदिन साथ में भोजन करते है। यहां की रामलीला मंडल के द्वारा ही इंदिरा गांधी स्टेडियम में आयोजित दशहारा मेला में भी रावण दहन के दौरान रामलीला का मंचन होता है।


वर्जन .... 


गांव में करीब 60 साल से रामलीला का मंचन हो रहा है, जिसमें सभी पात्र ग्रामीण ही भूमिका निभाते हैं। दो माह पहले इसकी तैयारियां शुरू कर दी जाती है। सर्व समाज का इस आयोजन में शामिल रहते हैं। सभी कलाकार ही आर्थिक सहायक करते हैं। इसके अलावा चढ़ावा राशि भी आती है। इससे मंदिर का भी विकास कर रहे हैं। रामलीला मंचन के बाद रात को सभी कलाकार का भोजन होता है। प्रतिदिन एक एक व्यक्ति के यहां से भोजन बन कर आता है।


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