18 जून का नाम सुनते ही सिहर उठता है तखतगढ़: जलप्रलय की तीसरी बरसी पर फिर मंडरा रहा तबाही का साया
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चित्तौड़गढ़ - संदिग्ध अवस्था में मिला महिला का निर्वस्त्र शव, पुलिस जुटी मामले की जांच में

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2023 की काली रात के जख्म अब भी हरे, हजारों परिवारों का सवाल—क्या इस बार जागेगा सिस्टम या फिर डूबेगा शहर?

पुखराज कुमावत/तखतगढ़ (पाली)। 18 जून... यह सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि तखतगढ़ के हजारों लोगों के लिए एक ऐसा जख्म है जो तीन साल बाद भी नहीं भरा। जैसे-जैसे 18 जून नजदीक आती है, वैसे-वैसे कस्बे की गलियों, बस्तियों और घरों में एक अनजाना डर फिर से दस्तक देने लगता है। लोगों की आंखों के सामने 2023 की वह भयावह रात घूम जाती है, जब आसमान से बरसी आफत ने पूरे शहर को पानी के समंदर में बदल दिया था।
उस रात घरों में पानी नहीं, बल्कि मौत घुस आई थी। लोग अपने बच्चों को कंधों पर उठाकर छतों पर भागे थे। किसी का घर बह गया, किसी की दुकान उजड़ गई, किसी की जिंदगी भर की कमाई चंद घंटों में मिट्टी में मिल गई। महावीर बस्ती, खारचियावास, धोरावास, रामकावास, सैनिक कॉलोनी, डाकलो का वास और जालोर चौराहे से पुलिस थाने तक का इलाका जलप्रलय की विभीषिका का गवाह बना था।

*जब तखतगढ़ शहर नहीं, डूबता हुआ टापू बन गया था*

18 जून 2023 को चक्रवाती तंत्र के प्रभाव से हुई रिकॉर्ड बारिश ने पूरे कस्बे को घुटनों पर ला दिया था। कुछ ही घंटों में सड़कें नदियों में बदल गईं, गलियां झील बन गईं और मकानों में कमर से लेकर छत तक पानी भर गया।
बिजली गुल, मोबाइल नेटवर्क ठप और प्रशासन तक पहुंचने के रास्ते बंद हो गए। हजारों लोग अपने ही घरों में कैद हो गए। कई परिवारों को दो-दो दिन तक भोजन और पीने के पानी के लिए संघर्ष करना पड़ा। चारों तरफ सिर्फ पानी, अंधेरा, चीखें और मदद की पुकार सुनाई दे रही थी।
स्थानीय लोग आज भी कहते हैं—“वह बारिश नहीं थी, मौत का मंजर था।”
अगर तालाब की पाल नहीं टूटती तो शायद और भी बड़ी होती त्रासदी
स्थानीय बुजुर्गों और प्रत्यक्षदर्शियों का मानना है कि बायोसा मंदिर के समीप स्थित तालाब की कच्ची पाल का एक हिस्सा समय रहते नहीं टूटता तो तखतगढ़ का बड़ा हिस्सा पूरी तरह जलमग्न हो सकता था।
हालांकि पाल टूटने से पानी का दबाव कम हुआ, लेकिन डाकलो का वास क्षेत्र में तबाही का नया अध्याय शुरू हो गया। तेज बहाव ने कई मकानों को जमींदोज कर दिया। अनुसूचित जनजाति समुदाय के कई परिवार रातों-रात बेघर हो गए। जहां कल तक परिवार रहते थे, वहां अगले दिन सिर्फ मलबे के ढेर दिखाई दे रहे थे।

*बेटी के हाथ पीले होने थे, लेकिन घर ही बह गया*

जलप्रलय की सबसे दर्दनाक कहानियों में से एक डाकलो का वास के उस परिवार की है, जिसकी बेटी की शादी कुछ दिनों बाद होने वाली थी।
घर में खुशियों का माहौल था। रिश्तेदारों का आना-जाना शुरू हो चुका था। लेकिन बाढ़ ने एक झटके में सब कुछ खत्म कर दिया। मकान धराशायी हो गया, शादी का सामान बह गया और परिवार के सामने बेटी की शादी से पहले सिर छुपाने का संकट खड़ा हो गया।
समाजसेवियों और भामाशाहों ने आगे आकर बेटी की शादी तो करवा दी, लेकिन तीन साल बाद भी वह परिवार स्थायी पुनर्वास का इंतजार कर रहा है।

*हर बार बाढ़ आती है, हर बार वादे आते हैं... लेकिन समाधान नहीं*

तखतगढ़ का इतिहास बताता है कि यह पहली त्रासदी नहीं थी। 1989, 2006, 2016, 2018 और 2023 में आई बाढ़ों ने करोड़ों रुपये की संपत्ति और लोगों के सपनों को निगल लिया।
हर बार सर्वे हुए, दौरे हुए, घोषणाएं हुईं, राहत पैकेज आए, लेकिन स्थायी समाधान फाइलों से बाहर नहीं निकल पाया। 2023 की जलप्रलय के बाद भी बड़े-बड़े दावे किए गए, मगर आज तक ऐसा कोई ठोस प्रोजेक्ट धरातल पर नहीं दिखा जो भविष्य में तखतगढ़ को बाढ़ के खतरे से मुक्त कर सके।

*क्या हाईवे बन गया नई आपदा का कारण?*

स्थानीय नागरिकों और जानकारों का कहना है कि नेशनल हाईवे-325 के निर्माण के बाद जलभराव की समस्या और गंभीर हुई है। ऊंचे बने हाईवे ने बरसाती पानी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित किया, जिससे बड़ी मात्रा में पानी कस्बे की ओर मुड़ने लगा।
जालोर चौराहे की तरफ से आने वाला पानी सीधे निचले इलाकों में भर जाता है। दूसरी ओर वर्षों से उपेक्षित नालों, बंद जल निकासी मार्गों और गाद से भरे तालाबों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

*मानसून की दस्तक के साथ लौट रहा डर*

मानसून की पहली आहट के साथ ही तखतगढ़ में चिंता बढ़ने लगी है। जिन परिवारों ने 2023 में अपना घर, दुकान, सामान और जीवनभर की जमा पूंजी खोई थी, वे आज भी उस भयावह रात को नहीं भूल पाए हैं।
कई लोग बताते हैं कि तेज बारिश शुरू होते ही उन्हें नींद नहीं आती। बच्चे डर जाते हैं और बुजुर्ग पूरी रात जागकर पानी का स्तर देखते रहते हैं।

*सबसे बड़ा सवाल: क्या सिस्टम ने कुछ सीखा?*

तीन साल पहले आई जलप्रलय ने तखतगढ़ को चेतावनी दी थी। करोड़ों का नुकसान हुआ, लोग बेघर हुए, सपने टूटे और जिंदगी बिखर गई। लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है—क्या सिस्टम ने उस त्रासदी से कोई सबक लिया?
क्या तालाबों की सफाई हुई? क्या नालों का चौड़ीकरण हुआ? क्या वैज्ञानिक ड्रेनेज सिस्टम बना? क्या स्थायी बाढ़ प्रबंधन योजना लागू हुई?
यदि इन सवालों का जवाब “नहीं” है, तो तखतगढ़ का डर भी बेवजह नहीं है।

दैनिक सीधा सवाल की ग्राउंड रिपोर्ट

18 जून 2023 की जलप्रलय केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि व्यवस्थाओं की कमजोरियों का आईना भी थी। तीसरी बरसी पर तखतगढ़ सिर्फ अतीत को याद नहीं कर रहा, बल्कि भविष्य को लेकर सवाल पूछ रहा है।
तखतगढ़ आज भी जवाब मांग रहा है—क्या इस मानसून में सुरक्षा मिलेगी या फिर हजारों लोग एक बार फिर पानी, भय और बेबसी के भरोसे छोड़ दिए जाएंगे?
क्योंकि यहां के लोगों के लिए 2023 की बाढ़ कोई पुरानी कहानी नहीं, बल्कि आज भी जिंदा खौफ है। :::


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