प्यास से विकास तक: पोयणा ने रचा इतिहास, अतिक्रमण हटा तो खड़ा हो गया ‘जल मंदिर
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वर्षों की प्यास, संघर्ष और इंतजार के बाद गांव को मिली सबसे बड़ी सौगात

जनशक्ति, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के समन्वय ने लिखी विकास की नई इबारत

                        पुखराज कुमावत पोयणा

सीधा सवाल।सुमेरपुर।कहा जाता है कि इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का नहीं होता, इतिहास वहां भी लिखा जाता है जहां आम लोग अपने अधिकारों और भविष्य के लिए संघर्ष करते हैं। पाली जिले की सुमेरपुर तहसील के ग्राम पंचायत बामनेरा अंतर्गत पोयणा गांव ने ऐसा ही एक इतिहास रचा है। यह कहानी केवल एक पानी की टंकी बनने की नहीं, बल्कि उस सामूहिक संघर्ष की है जिसने वर्षों से प्यास से जूझ रहे गांव को विकास की नई पहचान दिलाई।

जब पानी बना सबसे बड़ा संकट
एक समय था जब पोयणा का नाम लेते ही सबसे पहले पेयजल संकट की चर्चा होती थी। गर्मी शुरू होते ही गांव में पानी की समस्या विकराल रूप ले लेती थी। महिलाओं को दूर-दराज क्षेत्रों से पानी लाना पड़ता था। कई परिवारों की दिनचर्या पानी की व्यवस्था में ही बीत जाती थी।
गांव की चौपालों, जनसुनवाइयों और प्रशासनिक बैठकों में वर्षों तक एक ही मांग गूंजती रही—
"गांव को स्थायी पेयजल व्यवस्था चाहिए।"

*स्वीकृति मिली, लेकिन अटक गया सपना*

समय बदला और जल जीवन मिशन के तहत गांव में विशाल उच्च जलाशय (ओवरहेड टैंक) निर्माण की स्वीकृति मिली। ग्रामीणों को लगा कि अब उनकी वर्षों पुरानी समस्या का समाधान होने वाला है।
लेकिन विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा सामने खड़ी थी।
जिस स्थान पर टंकी का निर्माण प्रस्तावित था, वहां अतिक्रमण था।
स्वीकृति थी।
बजट था।
योजना थी।
लेकिन जमीन उपलब्ध नहीं थी।
गांव में फिर चिंता का माहौल बनने लगा। लोगों को डर था कि कहीं यह सपना भी अधूरा न रह जाए।

*गांव ने ठानी, अब पीछे नहीं हटेंगे*

इस बार पोयणा ने हार मानने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना।
गांव के जागरूक नागरिक एकजुट हुए।
जनसुनवाई से लेकर प्रशासनिक कार्यालयों तक लगातार आवाज उठाई गई।
ग्रामीणों ने स्पष्ट कहा—
"यह केवल जमीन का मामला नहीं, गांव के भविष्य का सवाल है।"
पाली, सुमेरपुर और जोधपुर तक लगातार प्रयास किए गए। गांव की मांग धीरे-धीरे जनभावना बन गई।

*अतिक्रमण हटा, खुल गया विकास का रास्ता*

लगातार प्रयासों और जनदबाव के बाद जिला प्रशासन और उपखंड प्रशासन ने पूरे मामले को गंभीरता से लिया।
नियमानुसार कार्रवाई की गई।
अतिक्रमण हटाया गया।
भूमि उपलब्ध हुई।
और वर्षों से रुका सपना आगे बढ़ गया।
यही वह निर्णायक मोड़ था जिसने विकास की नई कहानी लिख दी।

*प्रशासन बना भरोसे का आधार*

ग्रामीणों का कहना है कि जिला प्रशासन और उपखंड प्रशासन ने इस पूरे प्रकरण में संवेदनशीलता, पारदर्शिता और सकारात्मक सोच का परिचय दिया।
अधिकारियों ने केवल कार्रवाई नहीं की, बल्कि समस्या का स्थायी समाधान खोजने का प्रयास किया।
गांव के लोग कहते हैं—
"जब प्रशासन जनता की पीड़ा को समझता है, तब विकास की रफ्तार खुद बढ़ जाती है।"

*मंत्री की सक्रियता को मिला श्रेय*

ग्रामीणों के अनुसार क्षेत्रीय विधायक एवं राजस्थान सरकार के कैबिनेट मंत्री जोराराम कुमावत ने भी इस परियोजना को प्राथमिकता दी।
उन्होंने विभिन्न स्तरों पर समन्वय स्थापित कर योजना को गति दिलाने का प्रयास किया।
ग्रामीणों का मानना है कि मंत्री की सक्रियता और विकास के प्रति प्रतिबद्धता ने इस परियोजना को धरातल तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

*गांव की एकजुटता बनी सबसे बड़ी ताकत*

इस विकास यात्रा में सरपंच एवं प्रशासक रमणीक त्रिवेदी सहित गांव के अनेक जागरूक नागरिकों का योगदान उल्लेखनीय रहा।
भगवत सिंह देवड़ा, नारायण भारती, देवाराम जालोरा, रामलाल जालोरा, भरत सिंह देवड़ा, धनाराम प्रजापत और भीमाराम देवासी सहित अनेक लोगों ने इस जनहित के मुद्दे को लगातार जीवित रखा।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समाज एकजुट नहीं होता तो शायद यह सपना साकार नहीं हो पाता।

*जब पत्रकारिता बनी जनआवाज*

इस पूरी विकास यात्रा में स्थानीय संवाददाता पुखराज कुमावत ने भी गांव की पेयजल समस्या, अटके हुए निर्माण कार्य और ग्रामीणों की मांगों को समय-समय पर प्रमुखता से उठाया।
समाचारों के माध्यम से इस मुद्दे को लगातार सार्वजनिक विमर्श में बनाए रखा गया।
ग्रामीणों का मानना है कि सकारात्मक और जनसरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता ने गांव की आवाज को व्यवस्था तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

*आज गांव में उत्सव जैसा माहौल*

आज गांव के बीचों-बीच खड़ी विशाल जल टंकी दूर से ही विकास की नई कहानी सुनाती नजर आती है।
निर्माण कार्य पूरा हो चुका है।
लोकार्पण का इंतजार है।
महिलाओं के चेहरे पर राहत है।
युवाओं की आंखों में उम्मीद है।
बुजुर्गों के मन में संतोष है।
लोगों को विश्वास है कि अब घर-घर तक नियमित पेयजल पहुंचेगा।
सिर्फ टंकी नहीं, यह संघर्ष की जीत है
पोयणा की यह कहानी केवल एक टंकी की कहानी नहीं है।
यह उस विश्वास की कहानी है कि जब समाज जागता है तो बदलाव संभव होता है।
यह उस संघर्ष की कहानी है जिसमें ग्रामीणों ने हार नहीं मानी।
यह उस प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कहानी है जिसने समाधान खोजा।
यह उस जनप्रतिनिधि की कहानी है जिसने विकास को प्राथमिकता दी।
और यह उस सकारात्मक पत्रकारिता की कहानी है जिसने जनहित के मुद्दे को मंजिल तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाई।

*पोयणा बना पूरे क्षेत्र के लिए मिसाल*

आज पोयणा केवल एक गांव नहीं, बल्कि एक संदेश बनकर उभरा है।
संदेश यह कि जनता जागरूक हो, प्रशासन पारदर्शी हो, जनप्रतिनिधि प्रतिबद्ध हों और समाज एकजुट हो जाए तो विकास की राह में खड़ी कोई भी बाधा स्थायी नहीं रह सकती।
कभी प्यास से पहचान रखने वाला यह गांव आज विकास, विश्वास और विजय की नई पहचान बन चुका है।
गांव के बीचों-बीच खड़ा यह ‘जल मंदिर’ आने वाली पीढ़ियों को हमेशा याद दिलाता रहेगा कि संघर्ष चाहे कितना भी लंबा क्यों न हो, सामूहिक संकल्प उससे हमेशा बड़ा होता है।


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