चित्तौड़गढ़ - भक्ति का रंग जब चढ़ता है तो व्यक्ति अपने हर कार्य को भगवान को समर्पित कर देता है - संत दिग्विजय राम
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सीधा सवाल। चित्तौड़गढ़। किसी 

भी ग्रंथ की रचना शुरू करने से पहले ग्रंथकार उसकी महिमा बताते हैं ताकि पढ़ने वाले व्यक्ति की रुचि उसमें जागृत हो l जो व्यक्ति भक्तमाल को पढ़ता या सुनता है उसमें अद्भुत चमत्कार होता है जो व्यक्ति तनमनस्त होकर इसको पढ़ेगा या सुनेगा उसके जीवन में चमत्कार होगा, जिस व्यक्ति के नेत्रों में आनंद के आंसू नहीं आते जिसका शरीर रोमांचित नहीं होता हो ऐसा निरस् व कठोर हृदय वाला व्यक्ति भी जब भक्त माल का अध्ययन करेगा तो वह तृप्त होगा और उसके मन में करुणा जागृत होती है , भक्तमाल ग्रंथ व्यक्ति के जीवन में भक्ति जगत का चमत्कार करता है ने की लौकिक जगत का l भक्तमाल की कथाओं से व्यक्ति के जीवन में भक्ति में प्रवेश करती है l भक्तमाल किया है ? इसके बारे में संत दिग्विजय राम जी बताते हैं की भक्तमाल पचरंगी फूलों की वैजयंती माला है कि तरह है इसको "नाभा" ( नाभा दास जी) नाम की सखी ने भगवान को पहनाने हेतु इसे तैयार किया है जिसको भगवान ने अपने वक्ष पर धारण किया है माला भगवान को बहुत ही प्रिय है माला भार की वजह से वक्ष से प्रभु चरणों में आ जाती है क्योंकि य़ह भार भक्ति का होता है इसलिए माला गले से श्री चरणों में आई l भक्तमाल, भक्त पुष्प का गुच्छा है वैजयंती माला अपने "पिउ " (ईश्वर) को पहनाने हेतु तैयार की गई है l व्यक्ति पर भक्ति का रंग जब चढ़ता है तो वह अपने हर कार्य को भगवान को समर्पित कर देता है ,शरीर से, वाणी से, मन से ,इंद्रियों से जो भी कार्य वह करता है वह भगवान के लिए करता है और अपने किए गए सभी कार्यों को भगवान को अर्पण करता है तब वह व्यक्ति भगवान को समर्पित हो जाता है l जिस प्रकार माली प्रेम व मन लगा कर फूलों की माला बनाता है तो उसे माला को प्रभु स्वीकार करते हैं l जीवन में पात्रता देखकर वस्तु को समर्पित करना चाहिए जो व्यक्ति स्वयं को तिनके से भी छोटा मानता तब जाकर व्यक्ति को प्रभु कृपा मिलती है l 

भक्त माल में भक्ति रूपी फूलों की माला प्रभु को वक्ष स्थल पर पहनाई गई थी लेकिन माला प्रभु के चरणों में आ जाती है क्योंकि प्रभु के हृदय में 'श्रीजी,(सीता महारानी)का स्थान है जबकि भक्तों का स्थान तो ईश्वर के चरणों में होता है अतः माला चरणों तक आ गई l हमेशा दासत्व भाव से ईश्वर की भक्ति करना चाहिए, हनुमान जी ने अपना परिचय हमेशा प्रभु राम का दास बताते हुए दिया है इसी प्रकार द्वापर में उद्धव जी कृष्ण के परम भक्त थे और मित्र भी थे उद्धव जी कृष्ण से कहते हैं कि मैं आपका मित्र तो हूं लेकिन आपका दास पहले हूं क्योंकि आपके वस्त्र, आभूषण, चंदन, माला आदि मेने धारण की है इसकी वजह से मुझ पर 'माया' का प्रभाव नहीं होता है l

 भक्तमाल में भक्ति को एक पौधा मानते हुए कहा गया है कि एक छोटे पौधों की रक्षा बकरी से और कोई उखाड़ कर ने ले जाए यह बात ध्यान में रखनी पड़ती है यहां बकरी 'माया' को बताया गया है माया हमेशा शत कर्म करने में बाधक होती है और भक्ति को खा जाती है तो पौधे की रक्षा के लिए सत विचार की बाढ़ लगाई जाती है धीरे-धीरे पौधा बड़ा होकर वृक्ष बन जाता है जिसमें अनेक प्रकार के लाभ लोगों को मिलता है इसी भक्ति रूपी वृक्ष की छाया लोगों को मिलती है और इसी भक्ति रूपी पेड़ से बड़े-बड़े हाथी झूलते हैं लेकिन पौधे पर कोई असर नहीं होता है यहा हाथी काम, क्रोध, मोह, माया को बताया गया है l भक्ति को एक को 'तरु'( लकड़ी) कहा गया है जिस प्रकार लकड़ी की नाव (भक्ति) पानी में पतवार (भक्ति) से तर जाती है और मल्लाह (सतगुरु है) इसको पार लगा देता है उसी प्रकार जीवन में व्यक्ति भक्ति के मार्ग पर चलता है और सद्गुरु की कृपा प्राप्त करने से उसका लोक व परलोक सुधर जाता है l


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