चित्तौड़गढ़ - चातुर्मास में बताई भगवान के अंतरंग भक्तों की महिमा
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चित्तौड़गढ़ - खेती की जमीन पर अवैध खनन ; लाखो टन निकली मिट्टी, खनिज विभाग अनजान, सरकारी प्रोजेक्ट में उपयोग में लेने की आशंका

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सीधा सवाल। चित्तौड़गढ़। रामद्वारा चित्तौड़गढ़ में जारी चातुर्मास सत्संग में सोमवार को रमताराम महाराज के शिष्य दिग्विजय राम महाराज ने भक्तमाल ग्रन्थ अन्तर्गत नामा जी महाराज ने 12 प्रमुख भक्तों का उल्लेख किया।

विधि, नारद, शंकर, सनकादिक, कपिल, मनु, नरहरिदास, भक्त प्रहलाद, जनक, बली, भीष्म पितामह, सुखदेव, धर्मराज आदि बारह प्रमुख भक्त जो भगवान के अन्तरंग सखा बताये गये। इन द्वादश प्रमुख भक्तों के जो यश गावे, या सुने, वह अंत में गो-लोक में प्राप्त होता है। द्वादश प्रमुख भक्तों में प्रथम विधिभक्त स्वयं ब्रह्मा जी का प्रादुर्भाव हुआ जिन्होंने एक हजार वर्ष कठोर तपस्या कर चतुष्लोक की भागवत का निर्माण किया। ब्रह्मा जी ने सारे लोक का निर्माण किया। सृष्टि का निर्माण स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा करने के उपरान्त दुसरे प्रमुख भक्त नारद जी का जन्म ब्रह्मा जी की गोद में हुआ। ब्रह्मा जी ने नारद को सृष्टि का विस्तार करने की आज्ञा दी। पिता जी की आज्ञा न मानने पर नारद जी को तीन श्राप प्रदान दिये जिस कारण नारद जी दासी पुत्र भी कहलाये। नारद जी ने सुदामा पर्वत पर रात-दिन तपस्या कर राम संकीर्तन कर मोक्ष को प्रदान किया। नारद महाराज की प्रेरणा से रामायण ग्रंथ की प्राप्ति हुई।

भक्त नारद के वृतान्त में बताया कि ब्रह्मा जी गोद में उत्पन्न हुए गंधर्व का नाम उपवहरण था। ब्रह्मा जी के श्राप से नौ दासी पुत्र हुए। उन्होंने तपस्या की तब वो ऋषिकेश के रूप में प्रसिद्व हुए। कृष्णदत्त नाम के ब्राह्मण देवता की पत्नी सुन्दरी को हरिनाम कीर्तन करने की सलाह दी। जब पति घर आए तो उसने भी हठ कर गुरू बनाने के लिए प्रेरित किया। उसने कहा कि मैं अक्षय तृतीय को दीक्षा लेने को कहा। जब नारद जी गए तो देखा दोनों का देहान्त हो गया। नारद जी ने देखा पुनर्जन्म में पत्नि सुन्दरी राजा के यहाँ राजकुमारी बनकर आयी और कृष्णदत्त उसी राज के यहाँ हाथी बनकर आया। जब नारद जी आये तो राजकुमारी का स्वयंवर हो रहा था तो उसे पता चला कि मेरे पूर्व जन्म में वही हाथी उसका पति था तो उसने वरमाला पहनायी। नारद जी ने हाथी पर करूणा करके उसे ज्ञान दिया वह राजकुमार बन गया।

संसार में शंकर वैष्णवों में सबसे श्रैष्ठ हुए। वेद व्यासजी ने श्रीमद् भागवत में कहा कि शंकर राम शब्द की उपासना करते है और वो हमेशा राम नाम का जाप करते है। जबकि सभी शिव जी को सबसे ज्यादा जपते है। भगवान शंकर स्वयं अजन्मे है। रामनाम के प्रभाव से ही रा कहकर जहर पीया और म कहकर मुंह बंद किया। काशी में मुक्ति का मार्ग बताया कि मैं राम नाम मंत्र प्रदान कर उन्हें मुक्ति देता हुँ। भगवान शंकर के सिर पर चन्द्रमा शीतलता का प्रतीक है जबकि तीसरा नेत्र आग है। नाग में जहर है और सिर पर गंगा। गणेश का वाहन चुहा, कार्तिकेय का वाहन मोर और शकर जी के गले में नाग सभी एक-दूसरे के दुश्मन पर सभी में भगवान की कृपा से सभी व्यवस्थित है। इसी तरह सभी को विपरित परिस्थिति में सामंजस्य बना कर अनुकुल और प्रतिकुल को बिना घबराये भगवत नाम से समाधान मिलता है।


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