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सीधा सवाल। कपासन। अंबेश भवन में जैन आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज की 33 वीं पुण्यतिथि पर विशेष श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विराजित साध्वी विश्व वंदना जी ने आचार्य श्री को याद करते हुए कहा कि वे सरलता और सहजता की प्रतिमूर्ति थे।साध्वी जी ने बताया-आचार्य श्री का जीवन संयम और साधना से परिपूर्ण था। उनके नाम के अनुरूप ही उनसे आनंद की अनुभूति होती थी। पाथर्डी परीक्षा बोर्ड की स्थापना उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण है। वे आयंबिल तप में गहरी आस्था रखते थे। आज भी उनकी पुण्यतिथि पर आयंबिल तप का आयोजन किया जाता है।साध्वी परमेष्ठी वंदना जी ने कहा कि आचार्य श्री श्रमण संघ के प्राण थे। उनकी वाणी में तेज और ओज स्पष्ट झलकता था। उनके जीवन में कई चमत्कारी घटनाएं घटीं। 1952 में सादड़ी में आयोजित ऐतिहासिक साधु सम्मेलन में श्रमण संघ की स्थापना हुई। इसी दौरान आनंद ऋषि जी को श्रमण संघ का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। 1964 में वे श्रमण संघ के द्वितीय आचार्य बने। 1975 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने उन्हें राष्ट्र संत की उपाधि से सम्मानित किया। सूर्य प्रकाश सिरोया द्वारा संचालित इस धर्मसभा में साध्वियों ने कहा कि आचार्य श्री का जीवन सभी के लिए प्रेरणास्रोत है।