चित्तौड़गढ़ - स्कूली खिलाड़ियों के बजट पर खेल गुरुजी का डाका !
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चित्तौड़गढ़ - अजब बेबसी..बंदर और मदारी की रस्साकशी....!

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चित्तौड़गढ़ - लकड़ियों से चला रहे भंडारा, हर दिन तीन हजार से ज्यादा ले रहे प्रसाद

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मनमाने बिल पास करवाने की तैयारी, निजी स्कूल कर रहे हैं अभिभावकों से वसूली

सुभाष चंद्र बैरागी

सीधा सवाल चित्तौड़गढ़। जिले में आयोजित हुए स्कूली खेल प्रतियोगिताओं में बास्केटबॉल का खेल शुरू से ही विवादों के साए में है। पहले टीम चयन को लेकर शिक्षा विभाग में इस खेल के मठाधीशों में हुए विवाद में विभाग की जमकर फजीती हुई है। वहीं अब राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं से वापस लौटकर आए खिलाड़ियों के खर्चे में बजट में गड़बड़ी की आशंका गहराने लगी है। इस मामले में जो जानकारी सामने आ रही है वह शिक्षा विभाग में कार्यरत 'खेल गुरुजी' के कारनामो से विभाग को शर्मसार करने वाली तस्वीर बनाने की कवायद प्रतीत हो रही है। सूत्रों से जानकारी में सामने आया है कि विद्यार्थियों को राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में प्रतिभागी बनाकर ले जाने के दौरान विभाग के तय मापदंडों से अधिक राशि खर्च की गई है। सरकारी स्कूलों में जहां यह राशि विद्यालय के छात्रकोष से उठाये जाने की तैयारी कर ली गई है। वहीं निजी विद्यालय भी खेल गुरु जी के द्वारा दिए गए बिल अभिभावकों के माथे थोप रहे हैं। ऐसे में यह लगने लगा है कि स्कूली विद्यार्थी अपने खर्चे पर खेल में भविष्य तलाश रहे हैं। क्योंकि सरकारी विद्यालय की छात्रनिधि भी विद्यार्थियों का पैसा है तो निजी विद्यालय में अभिभावकों की जेब खाली करवाई जा रही है। और उस पर बड़ी बात यह खेलों के लिए टीम लेकर जाने वाले दल प्रभारी मापदंडों से अधिक का बिल प्रस्तुत कर खुद भी बहती गंगा में हाथ धोने से नहीं चूक रहे हैं। ऐसी स्थिति में जांच कमेटी गठित होने पर और पूरे मामले की जांच होने पर यह स्पष्ट हो जाएगा की खेलों का ज्ञान बांटने वाले गुरुजी बच्चों को कितना चूना लगा रहे हैं।

मापदंड में आधा किराया बिल एसी का!


जानकारी में सामने आया कि चित्तौड़गढ़ से श्रीगंगानगर स्थित एक निजी विद्यालय में राज्य स्तरीय बास्केटबॉल प्रतियोगिता का बालिका वर्ग के लिए आयोजन किया गया था। जहां की दूरी 673.3 किलोमीटर है। और ऑनलाइन बुकिंग पर किराया लगभग 1200 रुपए का है। लेकिन विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार यहां किराया भी बढ़ा दिया गया और दूरी भी बढ़ा दी गई। नियमों के अनुसार विद्यार्थियों को प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम छूट देता है। और किराया आधा लगता है। लेकिन खेल गुरुजी यहां अपनी जेब गर्म करने से नहीं चूक रहे हैं। वही गुरु जी की जब गर्म करने के लिए निजी स्कूल अपने विद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के अभिभावकों की जेब काट रहे हैं।

कैंप के नाम पर भी वसूली हुई औपचारिकता


जिला स्तरीय टीम चयन के बाद प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया जाता है, चित्तौड़गढ़ जिला मुख्यालय पर एक निजी विद्यालय में इस शिविर का आयोजन किया गया। इसके लिए स्थानीय खिलाड़ी होने पर उन्हें अल्पाहार के लिए ₹30 का भुगतान देने का प्रावधान है। लेकिन यहां भी 150 रुपए का बिल पेश किया गया है। जबकि यह राशि आवासीय शिविर के लिए होती है। लेकिन जानकारी में सामने आया की मुख्यालय पर आयोजित हुए शिविर में बास्केटबॉल में अधिकांश खिलाड़ियों के स्थानीय होने से आवासीय शिविर लगाया ही नहीं गया। केवल कागजों में आवासीय शिविर बता कर गुरुजी अपनी जेब गर्म करने की कवायद में जुटे हुए है। यहां यह भी बता दे की टीम चयन को को लेकर मठाधीशों की बीच हुई खींचातानी के चलते अंतिम समय तक बालक वर्ग की टीम का चयन बड़ी मुश्किल से हो पाया था। वही इस उठा पटक के चलते प्रशिक्षण शिविर भी सही तरीके से आयोजित नहीं हो पाया। ऐसी स्थिति में काम भले ही सही नहीं हुआ हो लेकिन भुगतान पूरा होना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं है कि शिक्षा विभाग में खेल की जिम्मेदारी उठा रहे अधिकारी इस सारे गड़बड़झाले को शह दे रहे है। क्योंकि ड्यूटी लगाने से लेकर खेलों के आयोजन और टीम चयन में लगातार गड़बड़ियां हुई है। और बाद में जिला स्तरीय टीम बनानी पड़ी और खुद जिले के जिला कलेक्टर को हस्तक्षेप करना पड़ा। इतनी गड़बड़ियों के बाद भी खेल गुरुजी अपनी जेब कम करने का रास्ता तलाशने से बाज नहीं आ रहे हैं।

इधर निजी स्कूल कर रहे हैं अभिभावकों से वसूली


शिक्षण शुल्क खेल शुल्क और अलग-अलग तरह से अभिभावकों की जेब पर कैंची चलाने वाले निजी विद्यालय भी इसमें पीछे नहीं है। सूत्रों ने यह भी बताया कि राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेने वाले खिलाड़ियों को लेकर उनके प्रचार का श्रेय लेने वाले निजी विद्यालय खेल आयोजन में भाग लेने के लिए खर्च हुई पूरी राशि अभिभावकों से वसूल कर रहे हैं। जबकि विद्यालय की फीस के साथ प्रत्येक छात्र की यह राशि निजी विद्यालय पहले वसूल कर लेते हैं और बामुश्किल उंगलियों पर गिने जाने लायक विद्यार्थी खेल प्रतिभाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर पाते हैं। उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा को पहले तो प्रचार में यह निजी विद्यालय भुनाते है। और बाद में उसके लिए अभिभावकों से वसूली भी करते हैं। ऐसी स्थिति में ऐसे निजी विद्यालयों पर भी करवाई किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है। क्योंकि दोबारा राशि वसूल कर यह अभिभावकों के साथ सीधी सीधी धोखाधड़ी कर रहे हैं।

कहीं इसलिए तो नहीं बढ़ा बजट !


सामान्य तौर पर व्यक्ति अपने घर या परिवार यह स्थानीय क्षेत्र में होने पर अपनी कई इच्छाओं को पूरा नहीं कर पता है। लेकिन जब कहीं बाहर जाने का अवसर मिलता है तो अपनी ऐसी इच्छा जिन्हें परिवार या समाज नीतिगत नहीं मानता उन्हें पूरा करने के लिए व्यक्ति अवसर तलाशता है। और ऐसी स्थिति में बाहर जाने पर सहजता से गैर नीतिगत इच्छाएं पूरी हो पाती है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि ऐसे किसी छुपे हुए खर्च का भार अपनी जेब पर पड़ने से बचने के लिए अधिक राशि के बिल प्रस्तुत किए गए हैं। जिससे कि गैर नीतिगत व्यक्तिगत खर्च पूरे किए जा सके। फिलहाल कई ऐसे बिल विद्यालयों में प्रस्तुत कर दिए गए हैं जिनका भुगतान होना शेष है। अब देखने वाली बात होगी कि जिले के शिक्षक विभाग में बैठे जिम्मेदार खेलों को लेकर हुई फजीती के बाद विद्यालयों के छात्र निधि और निजी विद्यालयों द्वारा अभिभावकों की जेब पर कैंची चला कर वसूल की जाने वाली राशि को लेकर किस प्रकार कार्यवही करते हैं। और गड़बड़ियों में शामिल ऐसे खेल गुरु जी के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई कर पाते हैं।


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